आँखो से नींद का उखड़ा रिश्ता

ना जाने कब,
मेरी नींदो ने मेरे आँखो से रिश्ता तोड़ लिया
ना जाने कब,
इनमे कहा सुनी हुई, जिसका इल्म मुझे भी नहीं
फिर भी,
आँखो को हर रोज़ नींद का इंतेज़्ज़र होता है
उसे नींद से थोड़ा प्यार तो है
आँखे हर रोज़ नींद का इतेज़्ज़र करती हैं
घड़ी घड़ी सुई बस टिक टिक करती जाती है
लेकिन नींद कही और जाके बैठी,
आँखो तक नहीं आती है
आँखे बेचारी,
इंतेज़्ज़र में थकती जाती हैं
बेबस सी ख़ुद को सताती हैं
एक रोज़ कभी,
जब नींद से मुलाक़ात हो
मैं उससे पूछना चाहती हूँ
बताए क्यूँ ऐसे आँखो को इतना सताती है
बेवजह क्यूँ ऐसे रुलाती है
आँखो की हालत देख मैं रो पड़ूँ इतना तड़पती हैं
आँखे जैसे ख़ुद को इश्क़ में क़ुर्बान करती हैं
और नींद उसके बेबसी के मज़े लेती है
उफ़, बेबस सी ये आँखे
नींद के बिना जी नहीं सकती
नींद बिना आँखो को सताते रह नहीं सकती
हर रोज़ आँखें
यही सोचती हैं कैसे नींद को मनाए
उसे अपना बेइम्तिहान प्यार दिखाए
दुआ है मेरी रब से
जल्दी ही इनका मिलन हो
और दोनो एक दूसरे के संग हो

