बात दक्षिण भारत की करवट लेती राजनीति की, दक्षिण भारत की राजनीति की बात की जाये तो मुख्यत तमिलनाडु का जिक्र पहले आता है। हालाकि कर्नाटक है, केरल है, आंन्घ्रा है। लेकिन जितना दमदार प्रभाव तमिलनाडु की राजनीति नें डाला है, वो वाकि राज्यो ने शायद नही, और ये प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर भी है। पिछले तीन दशकों से तमिलनाडु की राजनीति में महत्वपूर्ण सितारा रहकर अपनी शर्तों पर राजनीति करने वाली जयललिता अब नही रही, तो जयललिता के जाने के बाद शशिकला को पार्टी की कमान सौपी गयी है। लेकिन वो कितना प्रभाव रख पायेगी। ये देखना होगा। और कितना सामंजस्य पनीरसैल्वन रखेगे ये भी गौर करने लायक होगा। जयललिता यानि अम्मा की राजनीतिक शैली की यही विशेषता थी कि उनका व्यक्तित्व, रहन-सहन अभिजात समाज को लुभाता था, लेकिन उनकी ज्यादातर नीतियां गरीबों को आकर्षित करती थीं। उन्होंने गरीबों के लिए सस्ती अम्मा कैंटीन चलाई और स्कूटर सब्सिडी से लेकर स्पेशल मैटरनिटी स्कीम तक कई अनोखी योजनाएं लेकर आईं। किसानों के लिए कावेरी नदी से ज्यादा पानी हासिल करने के लिए अदालतों में लंबी लड़ाइयां भी लड़ीं। सवाल है कि उनकी मृत्यु के बाद राज्य की द्रविड़ राजनीति कैसा मोड़ लेने वाली है? अभी तो ओ. पनीरसेल्वम ने कुर्सी संभाल ली है, लेकिन पार्टी और सरकार के बीच सामंजस्य बनाए रखने की चुनौती उनके लिए काफी मुश्किल साबित होने वाली है। विधायकों पर उनका प्रभाव ठीक-ठाक है, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं और लोकसभा-राज्यसभा के सदस्यों पर भी उनका नियंत्रण रहेगा, फिलहाल यह कहना मुश्किल है। उधर डीएमके के पितामह करूणानिधी की तबियत भी नासाज है। डीएंमके की कमान स्टालिन को दी गयी है। स्टालिन को धर मे ही जूझना होगा। तो इन दोनो को कमान मिलना तमिलनाडू की राजनीति के नये चेहरों की तरफ ले जाने की शुरूआत है। तमिलनाडू पहला राज्य है, जिसने देश को क्षेत्रीय दलों की राजनीति से सबसे पहले अवगत कराया. किसी भी राज्य के राजनीतिक पहलुओं को समझने के लिए सबसे पहले वहां की दलीय सांगठनिक स्थिति को समझना होगा. तमिलनाडू के इतिहास पर नजर डालें तो 1916 में टीएम नायर और राव बहादुर त्यागराज चेट्टी ने पहला ग़ैर-ब्राह्मण घोषणापत्र जारी किया था और 1921 में जस्टिस पार्टी ने स्थानीय चुनाव जीता था. बाद 1944 मे पेरियार ने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कड़गम कर दिया. ये एक ग़ैर राजनीतिक पार्टी थी, जिसने पहली बार द्रविड़नाडु (द्रविड़ों का देश) बनाने की मांग रखी थी. 1965 में तमिलनाडु में भयंकर हिंदी विरोधी दंगे हुए. 50 के दशक में के कामराज और 70 के दशक में. एम. जी. रामचंद्रन ने हिंदी के ख़िलाफ़ ज़ोरदार अभियान चलाया था. इन दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों ने तमिलनाडु में हिंदी पढ़ाने का विरोध किया था. लोगों से कहा गया कि इससे तमिल भाषा पिछड़ जाएगी और हिंदी हावी हो जाएगी. भाषा की इस राजनीति के नाम पर एम जी ने ख़ूब वोट भी बटोरे. बाद में तमिलनाडु की राजनीति में 70 औरप 80 के दशक मे फिल्मो का प्रभाव भी रहा। ये कहा जाता रहा है कि तमिलनाडु में ‘स्टारडम’ के जरिए ही सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा जा सकता है. पांच मुख्यमंत्रियों में सी.एन.अन्नादुरई, एम. करुणानिधि, एम जी रामचन्द्रन, जानकी रामचंद्रन और जे जयललिता की कहानी यही कहती है। आन्ध्रा में एनटीआर आये. तो कहा जा सकता है कि फिल्मो का प्रभाव रहा है उधर कर्नाटक आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और केरल में क्षेत्रीय दलों का बोलबाला है. उनके दम पर इन राज्यों का सत्ता समीकरण बनता-बिगड़ता रहा है. फिर वह विधानसभा चुनाव हों या लोकसभा चुनाव, लेकिन केंद्रीय राजनीति के लिहाज़ से तमिलनाडु दक्षिण भारत का शायद सबसे अहम राज्य है. यही वजह है कि आज भी तमिलनाडु में राज्य सरकार क्षेत्रीय दलों की ही बनती है, और यह क्षेत्रीय दल केंद्र की राजनीति में पूरी दख़ल रखते हैं. तो कैसे बदल रही है तमिलनाडू की राजनीति…और क्या ये एक नये युग की शुरूआत है। 2

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