अरुण जेटली के 15 सवाल : रफेल पर सरकार की नयी तिकड़म

विवादास्पद रफेल सौदे पर पूछे गये प्रासंगिक सवालों का जवाब न दे कर लगातार तरह-तरह से बचाव की कोशिशों में लगी भाजपा की कोशिशों से इस मुद्दे पर भाजपा सरकार की कमजोरी का काफी कुछ पता चल जाता है। हाल ही में वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा आक्रामक रुख से यह मुद्दा फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया, जबकि सरकार असली सच्चाई को देश के लोगों के सामने लाने से रोकने में जुटी हुई है। रफेल पर ‘कांग्रेस पार्टी के झूठ’ को उजागर करने वाले 15 सवालों के जवाब से दरअसल इस सरकार की कारस्तानियों की ही पोल खुली है और ये मुद्दा वापस लोगों की निगाह में प्रमुखता से आ गया है। श्री जेटली ने जो सवाल उठाये हैं, उनमें से तीन प्रमुख सवालों के जवाब दिये जा रहे हैं -

यूपीए सरकार द्वारा देरी पर -

तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा 126 विमानों के तय सौदे की समयसीमा के दस्तावेजों से पता चलता है कि यूपीए सरकार 2012 से 2014 तक फ्रांस के साथ बातचीत में शामिल थी, जिसमें एचएएल के साथ विस्तृत कामकाजी समझौता, तकनीक हस्तांतरण के प्रावधान और रफेल विमानों के भारत में उत्पादन पर चर्चा शामिल थी।

दूसरी तरफ, भाजपा ने 26 मई, 2014 को सत्ता संभाली और उसके द्वारा आपात खरीद का तर्क दिये जाने के बावजूद आज तक एक भी रफेल विमान भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल नहीं किया जा सका है। अगर यह मान लिया जाए कि इस सौदे पर हस्ताक्षर होने के चार साल बाद पहला विमान 2019 में भी परिचालित हो जाएगा, तो भी 26 महीने की वार्ता के बाद सौदे को अंतिम रूप देने वाली पिछली सरकार को ‘अक्षम और अप्रभावी’ बताना वास्तव में बेतुका है।

कीमत से संबंधित तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने के विषय में

यह विडंबना ही कहा जायेगा कि मौजूदा सरकार बार-बार समझौते की कीमत से संबंधित तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप विपक्ष पर लगा रही है और इसके बावजूद वास्तविक खरीद राशि को प्रकट नहीं करना चाहती। 2016 में डसॉल्ट और रिलायंस द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के दस्तावेजों से पता चलता है कि 36 विमानों के इस सौदे की कुल कीमत करीब 60,000 करोड़ रुपये है, जो प्रति विमान 1,660 करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। यह 126 एयरक्राफ्ट खरीद के पूर्व सौदे के तहत प्रति विमान की कीमत से करीब तीन गुना अधिक है।

इसके अलावा, भारत-फ्रांस संयुक्त वक्तव्य के अनुसार विमान और प्रणालियां वही होंगी, जिसकी जरुरत वायुसेना को थी और जिनको एमएमआरसीए मूल्यांकन में वायुसेना ने परीक्षण और मंजूरी दे दी थी। इसका मतलब यही है कि 36 विमानों की बनावट और विशेषताएं बिल्कुल वही हैं, जिनको यूपीए सरकार ने तय किया था। यदि पहले वाले मूल समझौते में ये सभी चीजें लागत में शामिल थीं, तो फिर जेटली जी मौजूदा खरीद में लागत बढ़ने के लिये ‘ऐड-ऑन’ को कारण क्यों बता रहे हैं? इसका मतलब सिर्फ यही हो सकता है कि भाजपा भ्रामक तथ्यों और आंकड़ों को तोड़ने-मरोड़ने में लगी है और कीमतों में भारी बढ़ोत्तरी को जायज ठहराने के लिये ‘भारत के हिसाब से विशिष्टताओं और हथियारों’ वाला बेकार का तर्क दे रही है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है।

निजी कंपनियों और प्रक्रियाओं पर

सरकार यह कहकर कि ऑफसेट ठेका डसॉल्ट और एक निजी कंपनी के बीच का मामला है, इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं है, विमान बनाने के क्षेत्र में 60 साल का अनुभव रखने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एचएएल की बजाय कर्ज में डूबे अपने करीबी पूंजीपति के स्वामित्व वाली और चंद दिनों पहले ही बनी कंपनी रिलायंस डिफेंस को ठेके का तोहफा देने के औचित्य को सही ठहराने की कोशिश कर रही है। लेकिन 2016 में मौजूदा सरकार द्वारा जारी रक्षा ऑफसेट दिशानिर्देशों के मुताबिक यह जरुरी है कि ‘‘सभी तरह के ऑफसेट प्रस्तावों को अधिग्रहण प्रबंधक द्वारा संसाधित किया जाएगा और उनको रक्षा मंत्री द्वारा मंजूरी दी जायेगी, चाहे उनका मूल्य कुछ भी हो।’’ हालांकि यह स्पष्ट है कि ऑफसेट समझौते को आकार देने के लिये सरकार की अनुमति जरुरी है, सरकार अब बेवजह अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ रही है। अगर ऑफसेट समझौते का तोहफा दिलाने में रक्षा मंत्रालय की वास्तव में कोई भूमिका नहीं थी, तो जेटली जी और सरकार को जवाब देना चाहिए कि खुद को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी बताने वाली मोदी सरकार ने डीपीपी का उल्लंघन और उसे कमजोर क्यों किया तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता क्यों किया?

रफेल सौदे से जुड़े असली मुद्दों से भटकाने की कोशिश करने वाले अप्रासंगिक सवालों और भ्रामक जानकारी के जाल में उलझाने की भाजपा की रणनीति का ये एक और उदाहरण है। विपक्ष के खिलाफ आरोपों और दोष मढ़ने की कोशिश करने की बजाय सरकार को अपनी कार्यप्रणाली में थोड़ी पारदर्शिता लानी चाहिए और अपने कामकाज के लिये नागरिकों के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।

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