मोदी सरकार की नाकामियां

अब तो यह पूरी तरह आम हो चुका है कि मोदी सरकार खाली बड़ी-बड़ी बातें ही करती है। पीएमओ और अन्य विभाग सरकार की प्रमुख योजनाओं और नीतियों का प्रचार करने के नाम पर विज्ञापनों में भारी-भरकम पैसा खर्च करते हैं, लेकिन जब इन पर बारीकी से नजर डाली जाती है तो स्याह, विनाशकारी सच्चाई सामने आती है। प्रधानमंत्री मोदी की कई तथाकथित ‘विकास’ योजनाएं अपने शुरुआती चरण या आगे चलकर औंधे मुंह गिर चुकी हैं। सरकार की विफल योजनाओं में सबसे ताजा नाम हाई पावर इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव का है।

पीएम मोदी द्वारा इस बहुप्रचारित परियोजना को भारत की पहली उच्चस्तरीय विद्युत लोकोमोटिव के तौर पर प्रचारित किया गया। यह फ्रांसीसी कंपनी अल्स्टॉम और भारतीय रेलवे का संयुक्त उद्यम था, हालांकि, भाजपा सरकार द्वारा शुरू किए गए अन्य फ्रांसीसी संयुक्त उद्यम की तरह (राफेल) ही यह भी शुरुआती चरण में ही विफल साबित हुआ। 12,000 अश्वशक्ति के परीक्षण प्रदर्शन के दौरान ही ये नाकाम रहा और इसके सस्पेंशन प्रणाली में खामियां नजर आयीं। हाल की इस नाकामी को एक तरफ रखा जाये तो मोदी राज के दौरान कुछ अन्य प्रमुख विफलताओं पर भी विचार किया जा सकता है।

नमामि गंगे

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सत्ता में आने के बाद से ही स्वच्छ गंगा परियोजना मोदी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता का विषय बताया गया था। गंगा की सफाई के उनके लंबे-चौड़े दावे 2014 के चुनाव प्रचार के समय से ही शुरु हो चुके थे और अभी तक वो खत्म नहीं हुए हैं। गंगा की जो हालत चार साल पहले थी उससे भी कहीं ज्यादा आज स्थिति खराब हो चुकी है। हमारे प्रधानमंत्री द्वारा लोगों से किये गये अन्य वादों की तरह ही गंगा सफाई का वादा भी अब तक अधूरा ही है। इस परियोजना और विज्ञापनों से एक ही चीज हासिल हुई वो ये थी कि सरकार ने 2,037 करोड़ रुपये आवंटित किये और जल संसाधन मंत्रालय में ही अलग से गंगा की सफाई के लिये एक विभाग की स्थापना की।

जन-धन योजना

2014 में प्रधानमंत्री ने सभी भारतीयों को बैंक खातों से जोड़ने के लिये प्रधानमंत्री जन-धन योजना की शुरुआत की। इस अत्यधिक महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिये एटीएम सुविधा, ओवरड्राफ्ट सुविधा, अल्पकालिक कर्ज और बीमा जैसी सुविधाएं मुहैया कराने का वादा किया गया था। आज उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक — जनवरी 2016 के बाद से जन-धन योजना वेबसाइट ने आंकड़ों का प्रकाशन बंद कर दिया था — इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि यह योजना अपने लक्ष्यों को हासिल करने में सफल हुई है। इस योजना की मुख्य खामी यह थी कि ज्यादातर खाते जीरो बैलेंस वाले थे यानी इनमें कोई पैसा जमा नहीं था। इस योजना की शुरुआत के चार साल बाद भी कुल खातों का पांचवां हिस्सा अभी भी निष्क्रिय बना हुआ है, लेकिन इस योजना को सफल दिखाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने इन खातों में अपनी तरफ से 1 रुपये से लेकर 10 रुपये तक जमा कराये हैं ताकि जीरो बैलेंस वाले खातों का प्रतिशत आंकड़ों में कम दिखाया जा सके।

इस योजना के प्राथमिक उद्देश्यों में से एक वित्तीय समावेशन का था, सरकार ने दावा किया था कि चूंकि अधिकांश घरों में कम से कम 1 बैंक खाता होता है, इसलिए ये धारणा थी कि परिवार के सदस्य खाते को साझा करते हैं। हालांकि, अध्ययन से अलग ही कहानी सामने आयी, इस योजना पर किये गये शोध से पता चला कि गैर-खाता धारकों का केवल 2 प्रतिशत ही किसी और के खाते का उपयोग करते हैं — इस प्रकार यह धारणा पूरी तरह से खारिज हो गयी कि योजना से वित्तीय समावेशन हो जायेगा।

इसके अलावा, इस योजना के तहत उन व्यक्तियों को जीवन बीमा देने का भी वादा किया गया था, जिन्होंने अगस्त 2014 से मार्च 2015 के बीच अपना खाता खोला। इस अवधि में 14.71 करोड़ बैंक खाते खोले गए, हालांकि सरकार ने केवल 3,421 जीवन बीमा दावों का वितरण किया जो कुल पात्र लाभार्थियों का केवल 0.002 प्रतिशत ही है।

स्वच्छ भारत

प्रधानमंत्री मोदी ने गांधीजी के सभी के लिये स्वच्छता और निर्मलता के सपने को हासिल करने के लिए स्वच्छ भारत मिशन शुरू किया था। हालांकि, सरकार द्वारा फैलायी गयी कहानी हकीकत से कोसों दूर है। संसदीय समिति की रिपोर्ट ने सरकार के इस दावे को खारिज कर दिया कि 84 प्रतिशत ग्रामीण परिवार खुले में शौच से मुक्त हैं और उनके पास चालू हालत में शौचालय हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि शौचालयों का निर्माण ही पर्याप्त नहीं है, लोगों को स्वच्छता की जरुरत के बारे में उचित ढंग से शिक्षित करने के लिए व्यवस्थित दृष्टिकोण होना चाहिए। यह तभी होगा जब लोग निर्मित शौचालयों का उपयोग शुरू करेंगे और भारत तभी असल मायनों में खुले में शौच से मुक्त होगा।

दूसरी तरफ, रिपोर्ट से यह भी खुलासा हुआ कि कई जगहों पर तो जो शौचालय कथित तौर पर बने हैं वो बस नाम के ही हैं। ज्यादातर शौचालयों में पानी, शेड या छत और जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है।

ये सच्चाई है कि मोदी सरकार अपने बुनियादी वादों को निभाने में ही बुरी तरह से विफल साबित हुई है। हमसे बुलेट ट्रेन और स्मार्ट शहरों का वादा किया गया था, हमें आर्थिक स्थिरता और तेज प्रगति का आश्वासन दिया गया था और सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हमें विकास का वादा किया गया था, लेकिन हमें सभी मोर्चों पर छला गया है। मोदी सरकार अपनी योजनाओं के प्रचार पर हजारों करोड़ रुपया फूंक चुकी है लेकिन उनका फायदा दे पाने में विफल रही है, जिससे ये साबित होता है कि ये सरकार और इसके नेता जमीनी हकीकत से पूरी तरह कट चुके हैं। मोदी जी हमें नौकरियां, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और अपने किसानों के लिए मदद की जरूरत है, चमकदार विज्ञापन और असफल बुलेट ट्रेन अब हमें और मूर्ख नहीं बना सकती।

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