‘‘लोकतंत्र सार्वभौमिक उसूल है’’

इसमें कोई शक नहीं है कि अमर्त्य सेन आधुनिक समय के सबसे महान विचारकों में से एक हैं। विकास के प्रति बेहतरीन नजरिया और सामाजिक आधारभूत संरचना के विकास में सरकारी निवेश के उनके विचारों ने उन्हें वैश्विक अर्थशास्त्र में ख्यातिलब्ध नामों में से सबसे अलग स्थान दिलाया है।

वे लोकतंत्र के प्रमुख ध्वजवाहक भी हैं और समग्र विकास हासिल करने के लिए उन्होंने लगातार मजबूत लोकतंत्र के महत्व पर जोर दिया है। हाल ही में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि सभी गैर-सांप्रदायिक ताकतों को वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के लिये एक साथ आना चाहिए, क्योंकि ‘लोकतंत्र खतरे में है। हमें निश्चित रूप से निरंकुशता के विरुद्ध विरोध जताना चाहिए। हमें निश्चित रूप से उनकी निरंकुश प्रवृत्तियों के खिलाफ लड़ना चाहिए। हमें निश्चित रूप से उन मुद्दों की आलोचना करनी चाहिए जहां हमें गैर-सांप्रदायिक दक्षिणपंथी ताकतों के विरोध की आवश्यकता हो। लेकिन जब बात सांप्रदायिकता से लड़ने की आये तो हमें बिल्कुल अपने हाथ पीछे नहीं खींचने चाहिए, जो आज सबसे बड़ा खतरा बन गया है।’’ भाजपा ने इसका जवाब देते हुए कहा कि ‘‘उन्होंने हमेशा समाज को गलत दिशा दी, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वो फिर से वही कर रहे है।’’

अमर्त्य सेन द्वारा सभी ‘गैर-सांप्रदायिक’ और ‘गैर-बीजेपी’ दलों से गठबंधन करने की अपील को भाजपा द्वारा खारिज करना और तिरस्कृत करना दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इसमें कोई हैरानी की बात भी नहीं है। आखिरकार, अमर्त्य सेन उन आवाजों में से एक है जो विविधता के बीच एकता का प्रचार करते हैं, जिस अवधारणा का भाजपा मूल रूप से विरोध करती रही है।

उन्होंने अपने सफल कैरियर में ‘स्वतंत्रता की तरह विकास’ के महत्व पर काफी जोर दिया है, जहां उन्होंने नागरिकों की गरीबी मिटाने और उनमें जिम्मेदारी की भावना पैदा करने के लिए लोगों को अधिक से अधिक राजनीतिक आजादी और अवसर देने का प्रस्ताव दिया है। इसलिये ये तो साफ है कि भाजपा क्यों डॉ. सेन के विचारों की खिलाफत करती है। अपने मूल संगठन आरएसएस की शाखा के तौर पर भाजपा चंद गिने-चुने लोगों के बीच ही सत्ता और अधिकार की बंदरबांट में भरोसा करती है। उनकी भारत की सोच ये है कि जहां आरएसएस की पसंद के धार्मिक कट्टरपंथी संगठन सामाजिक व्यवस्था को निर्धारित करें और संविधान केवल कागज के टुकड़े तक ही सीमित हो। ये काम मौजूदा भाजपा सरकार के तहत शुरु भी हो चुका है, क्योंकि हर लोकतांत्रिक संस्था को सरकार अब कमजोर कर रही है या उनमें आरएसएस के लोगों को भर रही है।

श्री सेन बहुदलीय व्यवस्था के दृढ़ समर्थक भी हैं। उनका कहना है कि ‘‘इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, ब्रिटिश शासन के अधीन भारत स्वतंत्रता प्राप्ति तक अकाल से जूझ रहा था, (स्वतंत्रता मिलने से चार साल पहले 1943 में मैं बच्चा था, तब मैंने अकाल देखा था), जो बहुदलीय लोकतंत्र और आजाद प्रेस की स्थापना के साथ ही अचानक गायब हो गया।’’

उनका मानना है कि कई पार्टियां मिलकर मजबूत गठबंधन बनाती हैं, जिससे कुल मिलाकर सरकार का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। निरंकुश प्रवृत्ति पर चलने वाली भाजपा के लिए इस तरह की राजनीति खतरे की तरह से है, क्योंकि उसमें शासन में सबको बराबर की भागीदारी के लिये सभी हितधारकों को फैसले लेने की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है। और भाजपा के लिये ऐसे व्यक्ति को निर्णय लेने की ताकत देना जो संघ की धारणा के अनुरूप न हो, भारी समस्या खड़ी कर सकता है।

उन्होंने अपनी पुस्तक ‘आईडेंटिटी एंड वॉयलेंस’ में वो इस बारे में बताते हैं कि लोगों की विविधता जब एक तरह की पहचान में सीमित हो जाती है तो किस तरह से साम्प्रदायिक हिंसा उत्पन्न होती है और राष्ट्र की वर्तमान स्थिति इस सिद्धांत की पुष्टि करती है। संघ का एकमात्र हथियार लोगों का ध्रुवीकरण करना है, ताकि वो भाजपा और आरएसएस की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने के लिए इसका उपयोग कर सके।

2019 में असली लड़ाई लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता बनाम तानाशाही और सांप्रदायिकता की होगी। भाजपा सांप्रदायिक नफरत और वंचितों के उत्पीड़न की अपनी प्रवृत्ति जारी रखेगी। लेकिन भाजपा के इसे खत्म करने के दृढ़ संकल्प के बावजूद हम अपने लोकतंत्र को दोबारा हासिल करने की पूरी कोशिश करेंगे। कांग्रेस हमेशा इसके लिये मजबूती से खड़ी रही है और ऐसा करती रहेगी।

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