हमारे शिक्षक, हमारे नेता

शिक्षण सिर्फ एक पेशा नहीं है, यह एक जुनून, उत्साह है, बेहतर दुनिया के एक चाहत है। ऐसी दुनिया जो ज्यादातर उतार और चढ़ाव से बनी हुई है, वहां एक अच्छा शिक्षक उम्मीद पैदा कर सकता है — जो दुनिया की बेहतर छवि को समझने में मदद करता है और सीखने की इच्छा को बढ़ावा देता है ताकि हमें विकसित होने में मदद मिल सके। इसलिये, हमारा मानना है कि हमारे आसपास जितनी भी नौकरियां हैं उनमें शिक्षा का पेशा सबसे कठिन है और सबसे ज्यादा जिम्मेदारियों से भरा हुआ है। शायद, यही कारण है कि पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि ‘‘शिक्षण बहुत ही महान् पेशा है जो व्यक्ति के चरित्र, क्षमता और भविष्य को आकार देता है। अगर लोग मुझे एक अच्छे शिक्षक के रूप में याद करते हैं, तो यह मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।’’
हमारे देश में हमारे गुरुओं या शिक्षकों के प्रति सर्वाधिक सम्मान और इज्जत रखने की समृद्ध परंपरा रही है। हमारी संस्कृति में अपने शिक्षकों के प्रति सर्वाधिक सम्मान का एक कारण ये भी है कि हमारे देश में उल्लेखनीय शिक्षक हुए हैं। चाणक्य से प्रो. अमर्त्य सेन, आर्यभट्ट से प्रोफेसर सी.वी. रमन आदि ऐसे नाम हैं। इसलिए, जब डॉ. राधाकृष्णन से उनके मित्रों और छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने का आग्रह किया, तो उन्होंने लोगों से अनुरोध किया कि वे इसे शिक्षक दिवस के तौर पर मनाएं ताकि सभी सभी शिक्षकों के प्रति सम्मान का भाव प्रकट किया जा सके और तभी से 5 सितम्बर का दिन शिक्षक दिवस के रूप में याद किया जाता है।
जब शिक्षकों की बात आती है तो कांग्रेस पार्टी का इतिहास काफी समृद्ध और अनमोल परंपराओं से भरा हुआ है। सर्वाधिक प्रसिद्ध कुछ कांग्रेस नेताओं, जिन्होंने शिक्षकों के रूप में अपनी भूमिका निभाई है, उनमें बाल गंगाधर तिलक का नाम शामिल है — जिन्होंने सांस्कृतिक शिक्षा पर जोर दिया और डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना करने में शामिल रहे जिसके बाद फर्ग्यूसन कॉलेज की स्थापना हुई — जहां उन्होंने गणित का अध्यापन कराया; गोपाल कृष्ण गोखले ने भारत में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी की स्थापना की; बिपिन चन्द्र पाल जिन्हें ‘क्रांतिकारी विचारों का जनक’ माना जाता है; डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जिन्होंने मुजफ्फरपुर में लंगत सिंह कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की और बाद में इसके प्रिंसिपल बने; भारत के पहले शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आजाद जो जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और जिन्हें आईआईटी और यूजीसी की स्थापना का श्रेय दिया जाता है; और डॉ. मनमोहन सिंह, जो दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रोफेसर थे। इसके अलावा, शिक्षकों की यह समृद्ध परंपरा केवल कांग्रेस तक ही सीमित नहीं रही बल्कि कांग्रेस के माध्यम से यह भारत की राजनीति में भी दिखाई देती है। भारत के राष्ट्रपति पद पर तीन राष्ट्रपति — डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और डॉ. जाकिर हुसैन — शिक्षक रहे थे और उन्होंने भारतीय शिक्षा में बड़े पैमाने पर अपना योगदान दिया।
हालांकि, शिक्षण और सीखना कोई ऐसी गतिविधि नहीं है जो कक्षा की सीमाओं के भीतर प्रदान किए गए ज्ञान और मूल्यों तक ही सीमित है, शिक्षक और छात्र के तौर पर इसका उपयुक्त उदाहरण क्रमशः पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा हैं। 1930–33 के बीच विभिन्न जेलों से अपनी बेटी इंदिरा को लिखे गये 196 खतों के जरिये पंडित नेहरू के शिक्षण का उदाहरण मिल सकता है। पंडित नेहरू अंतर्राष्ट्रयवादी प्रकृति के थे और यह उनकी बेटी को लिखे गये पत्रों से साफ जाहिर होता है, जिनके जरिये वो उन्हें विश्व इतिहास के सामने रखना चाहते थे। शिक्षक के तौर पर यहां एक पिता अपनी बेटी इंदिरा के माध्यम से भविष्य का निर्माण करने का इरादा रखते थे। कुल मिलाकर असल मायनों में शिक्षण यही है। इसलिए, अपने समृद्ध इतिहास से सीखते हुए सबसे पुरानी और सबसे सफल पार्टी होने के नाते भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस उन मूल्यों को प्रदान करने के प्रति संकल्पित है जिनसे हमें स्वतंत्रता संग्राम में सफलता मिली और बाद में हम राष्ट्र निर्माण में सफल हुए। जब तक हम उन मूल्यों और भावनाओं को नहीं सीखते, जिन पर देश की बुनियाद रखी गई थी, हम लक्ष्य में सुधार कैसे कर सकते हैं? इसलिए, सिर्फ भारत के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के सभी शिक्षकों के प्रति हम आदर व्यक्त करते हैं, जिन्होंने दुनिया को बेहतर जगह बनाने में अपना योगदान दिया है।
