ऋग्वेद की शांख्यायनी शाखा का आन्हिक
श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य पूज्य स्वामी सच्चिदानंद सरस्वतीजी कि अाग्यानुसार
रचयीता
शुक्ल जयानंद वजीभाई
एवम्,
छपाकर प्रसिद्ध करने वाले
अोझा विजयशंकर वि गौरीशंकर तथा प्रभाशंकर वि गौरीशंकर
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भावनगर:
दरबारी छापखानें में छपा
संवत् १९४६ सन् १८९०
हिंदी अनुवाद: कौशल त्रिवेदी, मुंबई
संवत् १९४६ सन् २०१७
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खाली
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प्रस्तावना
अनादीसिद्ध त्रिकाण्डात्मक एेसे वेदानूसार स्ववर्णाश्रमधर्म का जीवनपर्यंत अाचरण कर जीवन को सार्थक करना अावश्यक है। सर्व नदीयोंका जैसे सागर अयन है, सर्व शास्त्रोंका अंतिम अयन वेद है। पवित्र वेद का पठन पाठन अधिकार ब्राहम्णोंको है; अत: वे सर्ववर्णशिरोमणी एवम्् परम्् पूज्य हैं। प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों से प्रतित होता है कि पूर्वके ऋषीमुनि वेद वेदंाग एवम् सच्छास्त्रसंपन्न थे। कालान्तर सर्वोत्कृष्ट वेदविद्याका ह्रास हो रहा है जो अति शोचनीय है। भारत के अन्य भागों की तुलना में काशी में वेदप्रचार अब भी टिका हुअा है। अन्य भागों में वेदविद्या का विराम हो गया है ऐसा सभी जानते हैं।
ईसतरह वेदविद्या का ह्रास होता देख उसकी उन्नति एवम् वृद्धी हेतु श्री भावनगरमें संवत् १९४१ में वेदविद्योत्जेक ब्रह्मविहरिष्ठ श्रीभावनगरके पूर्वदिवान अाजम गौरीशंकर उदयशंकर अोझा, सी॰ एस॰ अाई॰ (उत्तरअाश्रम में स्वामीश्री सच्चिदानंदसरस्वती) ने महान् प्रतापी भावनगर भूपती श्री सर तख्तसिंहजी जी॰सी॰एस॰अाई॰ बहादूरके विजयी राज्यमें चारों वेदकि शाला का स्थापन किया है। इसमे चारों वेदोंके ब्राह्मणोंको उत्कृष्ट वेदाभ्यास कराया जाता है। वेदशाला की स्थापना कर ब्राह्मणोंपर उपकार करने के साथ चारों वेद के ब्राह्मणों को प्रात:काल से अारंभ कर रात्रिपर्यंत स्वशाखीय नित्यनैमितिकादी अावश्यक कर्तव्यकर्मों के अान्हिक श्रीमान् गौरीशंकरजी ने वडनगरनिवासी नागर ब्राह्मण वेदशास्त्र संपन्न शुक्ल जयानंद वजीभाई द्वारा तैयार करवायें हैं। ईन अान्हीकों को तैयार करनें में वेदमूर्जती जयानंदजी ने अत्यंत श्रम लेकर सर्वजनों का धन्यवाद प्राप्त किया है। यह अान्हीकों को कंई स्थलों पर समझने कि सुगमता हेतु टिप्पणी लिखने के कार्य में वेदमूर्ती नागर ब्राह्मण त्रवाडी मयाशंकर ने भी श्रम लेकर बडी सहाय की है।
उपर विदीत चारों वेदोंके अान्हिक तैयार हुएं है जो अल्प समय में छप कर प्रसिद्ध होंगे। ईनमें से यह एक ऋग्वेद शांख्यायनी शाखा के ब्राह्मणों को उपयोगी अान्हिक श्रीमत्परमहंस परिव्राजकाचार्य स्वामी सच्चिदानंद सरस्वतीजी कि अाग्यानूसार सद्धर्मनिष्ठ रा॰ रा॰ अोझा विजयशंकर वि॰ गौरीशंकरजी तथा रा॰ रा॰ प्रभाशंकर वि॰ गौरीशंकरजी ने भावनगर दरबारी छापखाने मे छपाकर प्रसिद्ध किया है जिसका सर्व ब्राह्मणोंने ब्रह्मतेजवृद्धी अर्थ अमूल्य लाभ लेकर ग्रन्थप्रसिद्धकर्ता के श्रम को सफल करेंगे एेसी अाशा है।
।। तथास्तु ।।
