भूत अंकल और टाइम-मशीन

Kumar Gautam
Jul 23, 2017 · 10 min read

शुभम् कभी भी गणित में पास नहीं हुआ। वार्षिक परीक्षा में शिक्षक या तो उसे ग्रेस मार्क्स दे कर पास कर देते थे या उसके पिता की उपलब्धियों को ध्यान में रख कर पास करा देते थे। सुन कर थोड़ा अटपटा लगता है- ‘एक आई-आई-टी के प्रोफ़ेसर का बेटा कभी गणित में पास नहीं होता।’ छटवीं कक्षा तक आते-आते शुभम् के पिता को उसके लिये छः स्कूल बदलने पड़े। हर बार उनकी प्रतिष्ठा पर एक प्रश्नवाचक चिन्ह लग जाता और हर बार वो रिजल्ट मिलते ही स्कूल बदल देते।

आज छमाही परीक्षा के परिणाम आ गये थे। सुबह, पिता ने घर से निकलते समय ही कहा था, “अगर फेल हो गये तो घर मत आना।” शुभम् फिर चार नंबर से फेल था। बच्चे अपने-अपने घर को चले गये पर शुभम् के पाँव, घर की तरफ हर बार बढ़ते-बढ़ते रुक जाते थे। उसे पिता की कही सारी पुरानी बातें याद आने लगी, “मैं गणित में १०० में १०० नंबर लाता था, कहाँ ये २० नंबर लाता है। आज ९० प्रतिशत का युग है। ऐसा रहा, एक दिन या तो ये लटक कर मर जाएगा या तो मैं।” शुभम् को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वो जाये तो कहाँ जाये चूंकि स्कूल आई.आई.टी कैम्पस में था तो सभी सहपाठी आस-पास ही रहते थे। अब तक कोई दोस्त नहीं बना था क्यूंकि किसी से भी ज्यादा मिलने-जुलने की मनाही थी। माँ-बाप की जिद्द पर वो दिन-रात आँखें किताबों में ही गड़ाये रहता था, भले ही वो कुछ पढ़े या ना पढ़े। कुछ समझ में नहीं आने पर शुभम् पुरानी टूटी स्कूल की प्रयोगशाला की तरफ चल पड़ा। कोई आस-पास होता तो शायद उसे मना भी करता। शुभम् सुस्त चाल में, पीठ पर भारी बसता उठाये सर झुकाता हुआ प्रयोगशाला के अंदर पहुँच गया।

प्रयोगशाला पूरी तरह खंडहर बन चुका था। वो प्रयोगशाला कम और स्कूल का स्टोर रूम ज्यादा दिख रहा था। स्कूल के टूटे पुराने डेस्क-बेंच, अलमारियाँ, बोर्ड, फोटो-फ्रेम, शील्ड, अर्ध-प्रतिमा, किताबें इत्यादि जैसी भिन्न-भिन्न चीज़ें इधर-उधर पड़ीं हुईं थीं। शुभम् एक टूटी हुई दीवार घड़ी की तरफ देखता हुआ ये सोचने लगा कि काश उसी घड़ी की तरह समय रुक जाता और वो वहीँ पड़ा रहता। कुछ देर इधर-उधर देखने के बाद शुभम् बोर हो गया। उसे भूख लगने लगी। फिर उसे याद आया कि उसने तो अपना टिफिन खाया ही नहीं है। शुभम् ने झट-पट से टिफिन निकाला और पराठा, आलू की सुखी सब्ज़ी और अचार गटक गया। खाते ही उसे उबासी आने लगी। वैसे भी उसे दोपहर में हर रोज़ सोने की आदत थी। शुभम् को पास में ही एक टूटा सोफा दिख गया और वो उस पर लेट गया। उसे पता ही नहीं चला कब उसकी आँख लग गयी।

करीब दो घंटों के बाद टॉर्च की तेज़ रौशनी जब शुभम् की आँखों में पड़ी तो नींद खुली। वो उठ कर बैठा ही था की पूरा खंडहर रौशन हो उठा। फिर उसकी नज़र उसके पास बैठे एक व्यक्ति पर पड़ी जिसकी उम्र करीब पच्चास के आस-पास थी, बाल बड़े-बड़े थे और उसने एक गोल टोपी पहनी थी। वो व्यक्ति ऐसा दिख रहा था जिससे अमूमन बच्चे डर जायें लेकिन शुभम् डरने के बजाय उससे कहा, “अंकल किसी और सोफे पर जा कर बैठो।” शुभम् के इस बात को ज्यादा तवज्जो दिये बिना उस व्यक्ति ने जवाब दिया, “घर जाओ, बहुत देर हो गयी है।”

शुभम् — क्यूँ ?

वो आदमी- घर वाले बहुत परेशान हो रहे होंगें!

शुभम्:- जाऊँगा तो वो ज्यादा परेशान हो जायेंगें। मैं यहीं सही हूँ।

वो आदमी- ऐसा क्यूँ?

शुभम् थोड़ी झुंझलाहट में अपने बैग से मार्क्स-शीट निकाला और उस आदमी को दिखाते हुए कहा, “पिताजी ने मुझसे कहा था कि अगर फेल होना, तो घर मत लौटना। और इस बार भी मैं फेल हूँ। अब अगर मैं घर गया तो सब मिलकर मुझे बहुत डांटेंगे। और क्या पता आज खाने की जगह मार ही खाने को मिले। कुछ समझ में आया।”

वो आदमी- माँ-बाप हैं तुम्हारे, थोड़ा डाँट ही देंगें तो क्या हो जायेगा? आखिर प्यार भी तो तुमसे उतना ही करते हैं।

शुभम्- थोड़ा नहीं। बहुत डांटते हैं। प्यार कोई नहीं करता। सबको बस प्यार है ९० प्रतिशत से। मुझे घर नहीं जाना।

वो आदमी शुभम् की मासूमियत भरे तर्कों को सुनता रहा और फिर प्रयोगशाला की खंडहर बन चुकी दीवारों को देखकर कहा, “अच्छा शुभम्, तुम्हें पता है कि ये इमारतें कैसे बनती हैं।” शुभम् एक झटके में कहा, “अंकल मैं पहले से ही बहुत परेशान हूँ। इमारतों की कहानी सुना कर और परेशान मत कीजिये।” ये कहते-कहते अचानक से शुभम् का ध्यान इस ओर गया कि आखिर उसका नाम उस आदमी को कैसे पता। फिर उसने आदमी से पूछा, “आपको मेरा नाम कैसे पता?” उस आदमी ने जवाब दिया, “मैं भूत हूँ, मुझे सब पता है।” ये सुनकर शुभम् ने जवाब दिया, “मैं ड्रेकुला हूँ, आप मानोगे।” शुभम् का ये वाक्य खत्म होता, कि उससे पहले ही वो आदमी अपनी ऊँगली के इशारे से शुभम् को ज़मीन से आठ फीट ऊपर पहुंचा कर फिर वापस ज़मीन पर बैठा दिया, टूटे पंखे को चला दिया, सोफ़े को उल्टा लटका दिया। इसके आगे वो आदमी और कुछ अपने भूत होने का प्रमाण देता शुभम् ने कहा, “मैं समझ गया कि आप भूत हो और आप कुछ भी कर सकते हो।” ये कहते-कहते शुभम् अचानक रुक गया और फिर थोड़ी देर के लिये बिल्कुल शांत हो गया मानो कि उसके दिमाग में किसी नयी योजना ने जन्म ले लिया हो। उसने भूत से कहा, “आप चाहते हो कि मैं घर चला जाऊं। ठीक है मैं चला जाऊँगा लेकिन इसके लिये आपको मेरा एक काम करना होगा।” शुभम् अपना मार्क्स-शीट भूत की तरफ बढाते हुए कहा, “मार्क्स बढ़ा दो मेरे। डैड भी खुश, मैं भी चला जाऊँगा।” भूत ने तपाक से जवाब दिया, “ये नहीं कर सकता।” शुभम् ने कहा, “क्यूँ। ये आपके वश में नहीं है।” वो भूत शुभम् के मार्क्स को बढ़ा कर फिर घटा दिया और तब कहा, “कर तो मैं कुछ भी सकता हूँ लेकिन ये नहीं करूँगा।” ये सुनते ही शुभम् खीझकर कर एक कोने में बैठ गया और बेबसी और मासूमियत से कहा, “फिर मैं भी नहीं जाऊँगा। मुझे नहीं डांट सुननी।” भूत उसके पास गया और कहा, “मान लो कि मैं मार्क्स बढ़ा भी दूँ लेकिन फिर फेल हुये तो तुम क्या करोगे?” शुभम् को भूत के इस बात में एक आशा दिखी और वो फ़ौरन अपनी झुंझलाहट भगाते हुए कहा, “फिर की फिर देखेंगें।“ शुभम् अब भूत के सामने जान-बुझ कर ज्यादा बेबस और लाचार बनने की कोशिश करते हुए कहा, “अंकल समझो। मेरे माँ-बाप को बस मार्क्स से प्यार है। विश्वास नहीं होता, आप मेरे घर चल कर देखो, सब इसी बात की तैयारी कर रहे होंगें कि कब मैं घर पहुँचूँ और सब मिलकर डाँटना शुरू करें। मेरे डैड तो हर वक्त डिक्सनरी साथ में ले कर घूमते हैं ताकि हर बार डांटते समय नये शब्द का यूज करें।” भूत ने शुभम् की बातों को गौर से सुना और फिर कहा, “चलो देखते हैं तुम्हारे घर में तुम्हें डाँटने की तैयारी कैसी चल रही है।” शुभम् ये सुनते ही भूत से थोड़ी दूर पीछे हटते हुए कहा, “मैं आपको घर क्यों ले जाऊं, नंबर तो बढ़ा नहीं रहे हो।”

उसके बाद भूत ने अपनी जेब से एक घड़ी निकाली और कहा, “वहाँ जाने की क्या ज़रूरत है। यहीं से देखते हैं।” शुभम् ये सुनते ही चौंकते हुए भूत के पास आ गया और कहा, “सच।” भूत अपनी उस घड़ी को शुभम् की कलाई पर बांधते हुए कहा, “ये है टाईम मशीन। इसके सहारे हम पास्ट, प्रेजेंट एंड फ़्यूचर देख सकते हैं। हमें जो भी देखना हो उस क्षेत्र में सबसे पहले सुई को डालते हैं फिर हम…” भूत की बातों को बीच में ही काट कर शुभम् ने कहा, “अंकल, ये सब बाद में बताना, पहले दिखाओ।” भूत ने अपनी घड़ी को सेट किया फिर अचानक उस घड़ी से एक चमकीली किरण निकली जो सामने की दीवार पर पड़ी और उस दीवार पर शुभम् के घर की तस्वीर उभर आयी और उसके घर में जो कुछ भी हो रहा था वो सब स्पष्ट दिखने लगा। उसकी माँ एक कोने में उदास रो है थी और कह रही थी, “पता नहीं कहाँ चला गया। सबके बच्चे घर लौट आये। शुभम् अभी तक नहीं आया।” ये देख कर भूत ने शुभम् से कहा, “तुम तो कहते थे कि तुमसे कोई प्यार नहीं करता।” शुभम् आगे कुछ बोलता कि तभी उसके उसके पिताजी की आवाज़ आयी- “एक दोस्त कह रहा था कि शुभम् फिर से फेल हो गया। उसे आने दो, पैर-हाथ तोड़ दूँगा उसका। एक तो फेल और अभी तक घर नहीं आया।” ये सुनते ही शुभम् बोल पड़ा, “देखा, आज जाता तो मेरा पैर-हाथ जाता। मैंने कहा था ना मेरे डैड सबसे खराब आदमी हैं।” तभी उसकी माँ ने कहा, “सब आपके कारण हुआ है, बेचारा ज़रूर आपके डर के कारण कहीं छुप गया होगा। अरे क्या हो गया अगर फेल ही हो गया। मैं कौन सी आई-आई-टी की पढ़ी-लिखी हूँ, जी रही हूँ ना।” तभी उसके डैड ने जवाब दिया, “तुम्हें क्या लगता है मुझे डाँटना अच्छा लगता है, मुझे खुशी होती है कि मैं अपने ही बेटे को कहता हूँ कि घर मत आना। लेकिन क्या करूँ, उसके भविष्य की चिंता है। मैं जानता हूँ कि हर बच्चे की अपनी काबिलियत होती है। वो नहीं ला सकता नब्बे प्रतिशत लेकिन फिर भी मैं उसे नब्बे प्रतिशत लाने के लिये बार-बार डांटता हूँ ताकि ज्यादा से ज्यादा नंबर लाये। कम से कम फेल तो नहीं करे।” ये सब सुन कर शुभम् को बड़ा अजीब सा महसूस हुआ। उसने आज तक अपने डैड के लिये ऐसा महसूस नहीं किया था। उसे यकीन नहीं था कि उसके घर नहीं जाने से उसके डैड परेशान हो सकते हैं और यही सब सोचते-सोचते शुभम् एक कोने में जा कर बैठ गया। भूत उसके पास जा कर बड़े प्यार से कहा, “तो अब घर जाओ।”

थोड़ी देर चुप रहने के बाद शुभम् बोला, “लेकिन डांट तो फिर भी पड़ेगी ना।” इस मासूम जवाब को सुनकर भूत को दया और हंसीं दोनों आयी लेकिन वो सारे भाव को छुपाकर शुभम् को बहलाने में लग गया, “अच्छा, जब तुम्हें डांट सुनना बुरा लगता है तो फिर क्यूँ नहीं मेहनत करते हो।” शुभम् ने कहा , “अंकल। कुछ समझ में तो आये! मैंने बहुत कोशिश की थी लेकिन जब बैक टू बैक फेल करता गया तो मुझे लगा कि मैं पास कर ही नहीं सकता लेकिन मेरे डैड मुझे अपनी तरह आइआइटीयन बनाना चाहते हैं। उन्हें कौन समझाए।” भूत ये सुनकर जोर-जोर से हँसने लगा और हंसते हुए कहा, “अब इस तरह से फेल करोगे तो पता नहीं क्या बनोगे।” इस तरह भूत को हँसते हुए देख कर शुभम् ने कहा, “अंकल हँस क्या रहे हो, कुछ ना कुछ तो बन ही जाऊँगा।” “कुछ ना कुछ बन ही जाऊँगा” इन शब्दों को दुहराते हुए भूत फिर से हँसने लगा। फिर उसने शुभम् से कहा, “शुभम्, क्यूँ ना टाईम मशीन में देखें कि तुम क्या ‘कुछ ना कुछ’ बनोगे।” शुभम् ने भी उत्सुकता दिखायी और सामने दीवार पर एक तस्वीर उभरी।

एक ऑडिटोरियम, जो लोगों से खचा-खच भरा हुआ था, उसके स्टेज पर शुभम् के माँ-बाप बैठे थे और शुभम् भाषण दे रहा था। ये देखते ही भूत ने कहा, “शुभम् वो तुम हो, सूट-बूट वाले।” शुभम् ने आश्चर्य से कहा, “मैं!” शुभम् अपने भाषण में कह रहा था, “मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं आइआइटीयन बनूँ लेकिन गणित में छठवीं कक्षा तक फेल करता रहा। फिर कुछ ऐसा हुआ कि सातवीं से पास करने लगा लेकिन नब्बे प्रतिशत मार्कस कभी नहीं आये। मैं आइआइटीयन नहीं बन पाया लेकिन आज जो कुछ भी हूँ सिर्फ़ माँ-बाप के डांट की वजह से, वर्ना मुझे खुद विश्वास नहीं था कि मैं लाइफ़ में कुछ कर भी पाउँगा।”

ये देखने के बाद शुभम् एक अजीब सी सोच में डूब गया। थोड़ी देर बाद शुभम् ने कहा, “ये मैं बोल रहा हूँ। पर ये मैं कैसे बोल सकता हूँ।” भूत ने कहा, “ज्यादा मत सोचो। क्यूंकि हर बच्चा जब बड़ा हो जाता है तो उसे माँ-बाप सही ही लगते हैं। अब घर जाओ और मेहनत करो।” शुभम् ने कहा, “क्या मेहनत करूँ, मुझे गणित समझ में ही नहीं आता है।” भूत ने इस पर जवाब दिया, “मैं तुम्हें पढाऊंगा। कल से आ जाना।” शुभम् अपना बैग उठा कर जाने लगा। फिर अचानक मुड़ कर कहा, “भूत अंकल, इस बार के लिये तो नंबर बढ़ा दो।” भूत ने कोई जवाब नहीं दिया। फिर उसके भाव को समझ कर शुभम् ने कहा, “ठीक है। मत बढाओ लेकिन अगली बार फेल मत करा देना।”

शुभम् वहाँ से घर पहुँचा। उसे देखते ही सब लोग पहले तो खुश हुए। सबको तसल्ली हुई कि शुभम् सही-सलामत है। फिर शुभम् के पिताजी ने उससे रिजल्ट दिखाने को कहा। उसकी माँ ने इशारे से पति को चुप रहने के लिये कहा लेकिन तभी शुभम् बोल पड़ा, “पापा-मम्मी आज मैं फिर से फेल हो गया…लेकिन ये आखिरी बार है, अब से मैं फेल नहीं करूँगा।”

उस दिन के बाद से शुभम् स्कूल के बाद शाम ढलते ही भूत से पढ़ने जाने लगा। उसे भूत के साथ पढ़ने में मज़ा आने लगा। शुभम् भी घर से टिफिन में ज्यादा खाना ले कर जाता और भूत को भी खिलाता। भूत और शुभम् में दोस्ती हो गयी। शुभम् को हर शिक्षक में भूत दिखने लगा। धीरे-धीरे शुभम् भूत के अलावे भी अन्य शिक्षकों से ध्यान लगा कर पढ़ने लगा। ऐसा करते-करते छह माह बीत गये और फिर वार्षिक परिक्षा हुई।

शुभम् पहली बार सत्तर प्रतिशत नंबर लाया। वो इस खुशखबरी को बताने दौड़ता हुआ उस पुराने खंडहर की तरफ गया। शुभम् ये देख कर हैरान और दुखी रह गया कि वहाँ कुछ लोग उस खंडहर को तोड़ रहे थे। शुभम् वहाँ के एक आदमी से पूछा, “इसे क्यूँ तोड़ रहे हो, यहाँ मेरा दोस्त रहता है।” उस आदमी ने जवाब दिया, “यहाँ नयी इमारतें बनेगीं।” शुभम्, “मेरा दोस्त कहाँ रहेगा?” उस आदमी ने जवाब दिया, “बेटा, ये सालों से बंद पड़ा था। यहाँ कोई नहीं रहता था।” तभी ऊपर का टूटा-टेढ़ा पंखा चलने लगा जिससे वो आदमी डर गया। शुभम् मुस्कुराते हुए वहाँ से उदास मन से वापस लौटने लगा की तभी अचानक उसके सर पर मंडराते काले बादलों से अँधेरा छा गया। उसने अपना सर उठा कर ऊपर देखा तो पाया कि बादलों के बीच से उसका भूत अंकल उसे ‘थम्ब्स अप’ कर रहा है। फिर बादल छँट गये और हमेशा-हमेशा के लिये वो भूत अंकल कहीं चला गया। वहाँ से शुभम् अपने घर लौट आया। माँ-बाप उसके मार्क्स देखकर बेहद खुश हुए और उस दिन के बाद से हर टीचर में शुभम् को भूत की शक्ल दिखने लगी और वो भूत उसकी ज़िंदगी का एक हिस्सा, प्रेरणा और साथी बन गया।

© कुमार गौतम

चित्रण: जयदीप जेना

Written by

I write and direct for TV, Film & Theater (http://www.youtube.com/user/writerdirectorgautam, https://kumargautam.wordpress.com/)

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