इज़हार — मेरे मन की बातें

मैं उदास हूँ
मेरी उदासी मुझे अकेला कर देती है
मुझे परेशान करती है
मैं चाहते हुए भी उससे उबरने का
रास्ता नहीं खोज पाती
ऐसे हाल में मैं क्या करूँ?

मैं खुश होती हूँ
अपने आसपास के माहौल से
लेकिन अचानक से
मेरे अकेलेपन में यह उदासी
मेरे करीब आ जाती है
मुझे शिद्त से कुछ भी करने का
मन नहीं करता, ना ही मैं चाहती हूँ कुछ करना!

सबकुछ कितना ठहर सा गया है
मेर सक्रियता कहाँ खो गई है?
ऐसी परिस्थिति से मैं खुश नहीं हूँ!
पता नहीं मुझे क्या हो गया है
कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है अब
मेरा काम इतना मजेदार है
और मैं कुछ नहीं कर रही हूँ
मेरी जिंदगी एक ऐसे मोड़ पर है
जहाँ पर ख़ुशी, आज़ादी, और बहुत कुछ करने के लिए है
लेकिन ना जाने मेरा मन कहाँ भटक रहा है?
ना जाने मैं इतनी शांत कैसे हो गई हूँ?
मुझे अब अपनी बातें साझा करनी है
लेकिन साझा करने से डर भी लगता है
की लोग क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे ?
सच कहते हैं कि जिसे जो सोचना है, उसे सोचने दो
बात जो मन में उसे शब्द दे दो।

इस कविता की रचना करने वाली — सुमिता के बारे में आपको बताते हैं। इन्हें पसंद है मन की बातें को पन्नों पाय लिखना, उन जज़्बातों को शब्द देना और उसे ज्यों-का-त्यों लिखना। ये मुंबई से आई हैं, और दिल्ली शहर में कढ़ीपत्ता ढूंढ रही हैं. अगर आपको मिले, तो ज़रूर बताएं।

दिल्ली मेट्रो में मेरे साथ एक मध्यम उम्र के महिला अपने परेशानी को लेकर बात कर रही थी, उसकी उदासी उसके चेहरे, बातों में नजर आ रही थी। बात करने के बाद लगा की, उसके मन के उदासी को एक कविता के रूप में लिखने के कोशिश की जाए। उसके मन में तैरने वाले ख्यालों को कविता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

Hi. We are glad you are here :) Welcome to this space to begin a new conversation about mental health by bringing in voices from all kinds of experiences.

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