२०१६ की मेरी सब से बड़ी सीख

सर्वप्रथम, आपको नव वर्ष की हार्दिक बधाईया। मैं कामना करता हूँ कि २०१७ आप के लिए समृद्धि, शान्ति और एक स्वस्थ जीवन लाये। 
 
जब से मैं स्टार्टअप की दुनियां में आया हूँ, मेरे को प्रत्येक दिन बहुत कुछ नया सिखने को मिलता है, परन्तु कुछ चीजे ऐसी होती है जो आप की आंखें खोल देती है, आप की सोच बदल देती है। और जब में २०१६ को पटल के देखता हूँ तो मेरे को ४ ऐसी सीख मिली है जो मैं आप के साथ बाँटना चाहता हूँ।

मैं आप को यह भी बता देता हूँ कि मैं हिन्दी में लगभग १५ वर्षो के बाद कुछ लिख रहा हूँ। आखरी बार मैंने हिन्दी में IIT JEE की परीक्षा लिखी थी :) लेकिन मैं उम्मिद करता हूँ की इस वर्ष मैं अपना हिन्दी कौशल वापिस हासिल कर लूंगा। थोड़ा व्याकरण पर, और थोड़ा शब्कोष पर काम करना है मेरे को।

१. स्टार्टअप बहुत ही कठिन है
मैंने लॉगिनरेडियस (LoginRadius) को २०१२ में स्थापित किया था और उस से पहले बहुत सारे और भी व्यवसायिक योजनाओ पर काम किया है, लेकिन २०१६ में यह पहली बार ज्ञात हुआ कि ९०% तकनिकी स्टार्टअप क्यों असफल होती है — क्योंकि तकनिकी स्टार्टअप बनाना बहुत “बहुत” कठिन है। आप अकेले मुशीबतों के पहाड़ से लड़ रहे होते हो। कभी निवेशक तो कभी ग्राहक आप के सामने समस्या खड़ी करते है, कभी आपके टीम का कोई सदस्य तो कभी आपके प्रतिद्वंद्वी आपकी योजनाओ को विलंब कर देते है। आप एक चीज को संभालो तो दूसरी आप के हाथ से निकल जाती है। और इन सब के साथ, आप को इन सब परिस्थितियों को संभालने का पूरा अनुभव नहीं; और आप के पास कभी भी पर्याप्त वित्तीय और मानवीय संसाधन नहीं होते है।

२. विनम्रता को लोग आप की कमजोरी समझते है
लोग आप को जब कमजोर आंकने की कोशिश करते है जब आप के पास उन से ज्यादा अधिकार हो — जैसे आप किसी नेतृत्व की भूमिका में किसी संसथान में। वो ही लोग आप की विन्रमता को आप की कमजोरी समझ लेते है। २०१६ में मैंने न केवल इस चीज का अनुभव किया, परंतु मेरे को ऐसे लोगों को पहचानने का तरीका भी आ गया है। ऐसे लोगों को संभालने का सब से अच्छा तरीका है की आप उनको अपने अधिकारों का अहसास करवाते रहो, और फिर भी कोई सुधार ना हो तो, आप को उन से नाता तोड़ना ही पड़ेगा।

३. आपका स्थान आपके पेशे (या लक्ष्य) के अनुकूल होना चाहिए
मेरे गावँ में आठ्वी तक ही विद्यालय था, तो आगे की पढ़ाई करने के लिए, मेरे को गावँ से जयपुर जाना पड़ा। फिर जयपुर में बाहरवीं कक्षा उतीर्ण कर के मुझे कोटा जाना पड़ा क्योंकि कोटा IIT JEE की तैयारी के लिए उपियुक्त स्थान था, और फिर धनबाद मेरे इंजीनियरिंग के लिए, फिर पेडरबोर्न (जर्मनी) इंटर्नशिप के लिए और अंततः, मैं एडमंड (Edmonton) मेरे स्नातकोत्तर के लिये। इन सब में एक चीज सामान्य है — मैंने अपने लक्ष्य के लिए उपियुक्त स्थान का चयन किया।

परंतु, पिछले सात साल से मैं यह बात भुल गया था। एडमंड (Edmonton) जैसे शहर, जहाँ पे मेरे को पता था कि मेरे सपने कभी पुरे नहीं होंगे, वहाँ पे मैंने अपने पिछले सात साल ख़राब कर दिए। पहले मैं अपना कैरियर और फिर अपनी स्टार्टअप बनाता रहा — दोनों ही चीजो के लिए एडमंड (Edmonton) एक उपियुक्त शहर नहीं था।

और जैसे ही मेरे को यह अहसास हुआ, तीन महीने के अंदर, मैंने सामान बाँधा और वैंकुवर (Vancouver) पहुँच गया। मैंने अब यह शपत ली है कि एक शहर में चार साल से ज्यादा नहीं रहना है!

४. दुनियाभर में पत्रकारिता लगभग मर चुकी है

यह ऐसी सीख है जिस ने सब से ज्यादा दुख पहुँचाया। हो सकता है आप मेरे से सहमत भी ना हो, लेकिन पिछले कुछ वर्षो से विभिन्न अखबारों और टीवी चैनल ने ऐसी रिपोर्टिंग की है कि पत्रकारिता से विश्वास उठ गया हैं। यह बात सिर्फ भारत में ही नहीं लेकिन पूरी दुनिया में है। अखबार और टीवी चैनल सिर्फ बड़े लोगों के हाथों की कठपुतली है जिसे वो लोग साधारण जनता को मुर्ख बनाने के लिए, नचाते रहते हैं। यह बड़े लोग राजनेता, व्यवसायी, अभिनेता और वो सब हैं, जिन्हें पैसा और राज चाहिए।

पत्रकारिता का यह गन्दा चेहरा चुनाव के समय सब से ज्यादा सामने आता हैं — चाहे वो भारत के २०१४ के चुनाव हो या फिर अमेरिका के २०१६ के चुनाव हो।

वैसे हिन्दी में लिखने का आनंद ही कुछ और है। मैं आप को जरूर कहूंगा की आप भी इस वर्ष कुछ भारतीय भाषा में लिखे।

आपका,
राकेश