याद

याद 
जाती ही नहीं
सिर्फ़ आती है और फिर आती ही रहती है

हौले से गुज़रती है और यूं थाम लेती है
दिखती नहीं पर झकझोर देती है
कभी साँसों से आह बनकर गुज़रती है
कभी पलकों के किनारे पे अश्क़ बन मचलती है
याद
जाती ही नहीं
सिर्फ़ आती है और फिर आती ही रहती है

दिल में आग बनकर जलती है
होंठों पे चुप्पी होकर रहती है
कभी अंदर तो कभी आसपास पलती रहती है
हर पल साथ चलती रहती है
याद
जाती ही नहीं
सिर्फ़ आती है और फिर आती ही रहती है

कभी गज़ल कभी नज़्म की गोद में सहारा ढूंढती है
कभी झूठी हँसी के आँचल में छुप जाती है
माज़ी की खिड़की में रोशनी ढूंढती है
तो कभी सपने में चहलकदमी करती है
याद
जाती ही नहीं
सिर्फ़ आती है और फिर आती ही रहती है

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