लकीर


एक लकीर उसने खींची माँ के आँगन में
और वो रंगोली बन गई
हथेली पर वो लकीर उसकी किस्मत बन गयी
फ़िर मेहंदी में रचकर वो लकीर उसको सपने दे गई
वही एक लकीर किसी ने जब उसकी मांग में सजाई
वो लकीर उसका सुहाग हो गई
दिन रात लकीर बनती मिटती गई
कभी हँसकर कभी रोकर वो जीती गयी
दहेज नहीं ला पायी इसलिए एक दिन जला दी गई
अस्पताल के कमरे में उस मशीन पर फ़िर बस एक लकीर रह गई

#dowrydeath

Like what you read? Give Pranjali Sirasao a round of applause.

From a quick cheer to a standing ovation, clap to show how much you enjoyed this story.