शाम


थककर शाम को
वो सबके साथ बैठकर चाय की चुसकियाँ होती थीं,
घर लौटती गायों के गले की घंटियाँ
शाम होने की आहट देती थीं,
शाम तब भी होती थी
शाम अब भी होती है,
लेकिन अब,
शाम के धुंधलके में आँखें
उन परछाइयों को ढूंढती हैं,
जब आँखें सिर्फ हँसा करती थीं

#childhood

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