रात के नीले निशानों में

ऐतराजों के आश्चर्य हैं दिल में ज़ाहिर होने वाली

सिहरन के सिवा

जंगल सांपों की बस्ती में

सन्नाटे का जहर पी रहा हो जब

तुम हो

इंतकाम ख्याल का खौफ

बस अड्डों में जलते पहियों से शमशानी माहौल में

लगी हो प्यास

सुबह रफ्तार मुझे ले चलेगी

मायूस राह तकने के मज़ाक तक

तुम हो

उमंग भरी दस्तक दरवाजे का खुलना समय का सच

खुद को ढूंढता खुदकलामी की शर्तों पर तन्हा

जो है मेरे ख्वाब की बोझिल मुस्कान में तुमसे ज्यादा करीब

उदास आँखों में शहर डूब गया हो

दूरी के किराये तक मुश्किल से मुमकिन

बदन की थकी परछाइयों की तरह

तुम्हारे ख्वाबों के घर लौट गया

जागृति के बलिदान में स्मृति के स्नान-गीत सा तुम्हारा प्रफुल्ल बदन

नींद में अनजान जिस्मो की तपती अभिलाषा बन

लबकुशाई चिंगारी बन-बन भूलता है कुछ

नीमबाज़ फासलों में यकीन और इख़्तियार के बिना

जलते जंगल के ज़हर में उलझे नक़्शे का तौर तुम हो

रात के नीले निशानों में नकारे रिश्तों के तले नींद है और तुम हो

सुबह तक.