ये भी क्या जीना कि हज़ारो अधूरी हों
ये भी क्या जीना कि हज़ारो अधूरी हों
ख़्वाहिशे कम रखो, ऐसी रखो कि पूरी हों ।
मंज़िल फिर मंज़िल है, ढूंढ़ लेगी राही को
शर्त है कि हर हाल, चलने की मंज़ूरी हो ।
वज़ूद अपने सफर का भी मुकममल कर
हो तो हो पीछे काफिले की मजबूरी हो ।
हौसला क्या है ये थक के बैठ जाने का
चल दो कि मेरे चलने को तुम ज़रूरी हो ।
उड़ान है ये, उड़ान तेरे भरोसे ही भरनी है
सांसों का रुकना क़ातिल है, चाहे जितनी दूरी हो ।
चेहरा आईना है मेरे, सफ़र के मिजाज़ का
बुझने न देना चेहरे को, जितनी भी कम नूरी हो ।