मेरे सब यार बिछड़ते जा रहे हैं

मेरे हालात उजड़ते जा रहे हैं

जीन से होता रहा था ज़िक्र-ए-यार

दाने वो तसबीह के बिखरते जा रहे हैं

साक़ी तू तो ना जाता मैखाने से

अनजाने बेग़ाने बेचैन पिये जा रहे हैं

कोई जल गया तो कोई हुआ दफ़न

सब मिलकत-ओ-माल छोड़ते जा रहे हैं

मंज़िल आख़री पर तो साथ ले जाते यारा

ना लौटने के इरादे से सब चले जा रहे हैं

ख़ुदगर्ज़ वो हैं तो कम हम भी नही

उन को याद करते जिए जा रहे हैं

मौत भी नाराज़ है हमसे आती जो नहीं

आरज़ू में ज़हर को धुआँ किए जा रहे हैं

जनाज़ा भी तैयार करलेंगे चार लोग आएँ तो

अकेले ही हम कफ़न को सिए जा रहे हैं

ऐ दिन-ए-आख़िर आज आ भी जा तू

हम आज यार से मिलने के लिए जा रहे हैं