ज़मीन के इस निकम्मे को आसमाँ दे गए, 
कुछ परिंदे मेरे लफ़्ज़ों को ज़ुबाँ दे गए।
मेरी बात पे हँसने वालों की बात कुछ आम थी,
फिर भी में क्या हु इस बात का गुमान दे गए।
खुश-मिजाज़ लोग भी बड़े अजीब मिजाज़ के मिले,
कुछ हसीन मुस्कानों के बदले दिल-ए-परेशान दे गए।