Aaditya TiwariMar 25
अनजाना सफ़र!
ना जाने कबसे कुछ भी बोलती नहीं निगाहें!
शायद लब और लफ़्ज़ों के दरमियाँ….
बहुत से बोल छिपे हैं!!
क्या वाकई कोई शब्द नहीं बचे,
या शब्दों का कोई अर्थ नहीं रहा!
पहले जो बातें मुस्करा कर….
खुद को बयाँ कर देती थी,
अब एक खाई सी बन गयी है बीच में!
क्या कश्मकश है की जो….
वो कुछ भी कह नहीं पाते,
वैसे तो लाशों को भी….
एक आख़िरी सलाम….
की रवायत है!