कोरा काग़ज़!
कोरा काग़ज़!
देखो तो लगता है खाली
अनछुआ, अनजान, कुछ अनकहा,
उस नीले आसमान सा
जिसका कोई ओर है ना छोर,
पर तमाम उम्मीदों से जिसे हम
एकटक नज़र गड़ाए देखते रहते हैं,
छिपा रखा है जिसने अपनी झोली में
अनगिनत तारों का संसार…
जो उम्मीद की किरण लिए टिमटिमाते रहते हैं,
कुछ ऐसा होता है
कोरा काग़ज़….अनकही बातों से भरा!
इस पर कुछ अप्रतिम स्मृतियाँ
छप जाती हैं..समय के साथ,
जिनको छिपाना चाहते हैं हम
कहीं गहराई में,
कोरे कागज़ की ओट में!
पर तारामंडल की तरह
ये एहसास, ये स्मृतियाँ भी…
अपने होने का परिचय देती हैं,
और ये उमंग कि
कभी कोई तारा,
सूर्य की तरह उदित होगा,
और कोरे काग़ज़ को
भरने का, अपने होने का मकसद देगा!!