कुछ इस तरह तय हुआ सांसों का सफर

इस तरह तय हुआ सांसों का सफर
की जिंदगी थक गयी, मौत चलती रही

एक दिन “सपने” ने बोला “प्रेम” से
आ दिखाऊ तुझे नई दुनिया प्यार की
जी सकेगा तू सब, जो अभी तक हुआ नहीं
“प्रेम” खुश हुआ, मन उसका मचलने लगा
उत्सुकता नई दुनिया की, हो प्रफुल्लित वो गया

लेकिन कुछ ऐसे तय हुआ हकीकत का सफर
की सपने दीखते रहे, हकीकत बदलती रही

“पाँव” ने बोला “आँख” से
ले चलूँ तुझे उस मंजिल, जिसके लिए व्याकुल है अभी
दे एक मौका अगर, बदल दूँ जीत को हार में और हार को जीत में
खुश हुई “आँख”, मंज़िल आसान लगने लगी

लेकिन कुछ इस तरह तय हुआ मंज़िल का सफर की
आँख रोती रही, पाँव छलते रहे

“रंग” बोला “चित्रकार” से
जो गर इस्तेमाल कर मुझे
बदल दूँ जीवन की छवि तेरी
भरोसा कर मुझपे, कर अपने को शामिल मुझमे

लेकिन कुछ इस तरह पूरा हुआ ज़िन्दगी का चित्र उसके
की रंग हुए सब एक और छवि बदलती रही

“प्रिया” ने कहा “प्रिया” से
नहीं जरुरत अब मुझे तेरे साथ की
सारी कसमें, वादे अब भूली बात हुई
एक बसा नीड पल में वीरान हुआ
और हो सपने क्षर्ण गए

लेकिन कुछ इस तरह फिर बढ़ा प्रेम उनमे
की बेचैनियां बढ़ती रही, दूरियां घटती रही

~~ अभिषेक तिवारी ‘अजेय’

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