Ravindra Yadav
Nov 4 · 1 min read

वो सरफिरी हवा थी संभलना पड़ा मुझे|
मैं आख़िरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे||

महसूस कर रहा था उसे अपने आस पास|
अपना ख़याल ख़ुद ही बदलना पड़ा मुझे||

सूरज ने छुपते छुपते उजागर किया तो था|
लेकिन तमाम रात पिघलना पड़ा मुझे||

मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू थी मेरी ख़ामोशी कहीं|
जो ज़हर पी चुका था उगलना पड़ा मुझे||

कुछ दूर तक तो जैसे कोई मेरे साथ था|
फिर अपने साथ आप ही चलना पड़ा मुझे||

Ravindra Yadav

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I am software development consultant from Allahabad, my hobbies are poetry, songs, cooking and last but mixed in my blood “Programming”.