Nov 4 · 1 min read
वो सरफिरी हवा थी संभलना पड़ा मुझे|
मैं आख़िरी चराग़ था जलना पड़ा मुझे||
महसूस कर रहा था उसे अपने आस पास|
अपना ख़याल ख़ुद ही बदलना पड़ा मुझे||
सूरज ने छुपते छुपते उजागर किया तो था|
लेकिन तमाम रात पिघलना पड़ा मुझे||
मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू थी मेरी ख़ामोशी कहीं|
जो ज़हर पी चुका था उगलना पड़ा मुझे||
कुछ दूर तक तो जैसे कोई मेरे साथ था|
फिर अपने साथ आप ही चलना पड़ा मुझे||
