“तुम जब पास आती हो”

Aman Sharma
Nov 4 · 2 min read

मैं वक़्त में क़ैद हूँ, एक ऐसे वक़्त में, जिस में तुम हो, मैं हूँ, हम हैं और हमारा वजूद है! मैं हारा नहीं हूँ, तुम हारी नहीं हो, हमारा वक़्त हारा नहीं है! आज भी एक एक एहसास का मोती पिरो कर रखा है हमारी यादों की माला में! मैं तुम्हारे बारे में बात करने से ऐतराज करता हूँ, पर जब भी करता हूँ तो एक सुकून मिलता है के तुम आज भी यहीं हो, सरमाई हुई यादों में मुझ में समाई हुई, महफ़ूज़ और शांत
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जानता हूँ, कई चाँद हो गए तुम्हें देखे हुए! याद है आज भी तुम्हारे चेहरे पर पड़ी हर वो लट, जो तुम्हारे आँसू छुपा रही थी, जब तुम जा रही थी ! चाहता था के तुम रुक जाओ और समेट लूँ अपना बिखरा जहाँ जो आज भी वक़्त के फ़र्श पर अपने बिखरे टुकड़े समेट रहा है! एक काँच की तरह टूटी थी तुम भी (शायद) , पर जरा सा भी शोर नहीं होने दिया; कहीं मैं उस शोर को सुन कर बिखर ना जाऊँ, शायद मैं तुम्हें रोक शायद मैं तुम्हें रोक ना दूं
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कोशिश की थी तुम ने अपनी मोहब्बत दबाने की, पर जब मोहब्बत का रंग इतना गहरा हो के, हर रोशनी के हर ज़र्रे में उसी का नूर हो, तो वो मोहब्बत कोई कैसे छुपाए! आज एक दोस्त से तुम्हारी बात की, और एहसास हुआ के मैं आज भी उसी SCHOOL Gate पर खड़ा हूँ, उसी लम्हे में, उसी वक्त में क़ैद! ये क़ैद अछी लगती है मुझे। तुम ना हो, तुम्हारा एहसास ज़रूर है इस में; आज भी वैसा ही, जैसा 8 साल पहले था, जब तुम ने पहली बार फोन किया था
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मैं तनहा रहता हूँ, सब में मौजूद मगर तनहा! ये असर है तेरी याद का, जो मैं हर पहर अपने संग लिए चलता हूँ! तुम्हारी हँसी, तुम्हारी उँगलिया और तुम्हारी आवाज़, तुम्हारा बस से रोज़ सुबह उतरना , जिस में मेरे हर दिन की शुरुआत हुआ करती थी। तुम्हारा छुप के से हाथ पकड़ने की कोशिश करना , पार्क में ज़मीन पर बैठ कर कुछ ना कहना, आस पास के शोर का ना सुनाई देना, बहती हवा का तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के साथ खेलना, और मेरा तुम्हारे चेहरे से वो लटों को हटाना, मैं आज भी उसी वक़्त में क़ैद हूँ, एक ऐसे वक़्त में, जिस में तुम हो, मैं हूँ, हम हैं और हमारा वजूद है!
तुम प्रतीक कुहाड़ के तुम जब पास आती हो जैसी हो (शायद)
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मैं आज भी उन्ही धुंधली तस्वीरों में क़ैद हूँ! कब तक रहूँगा किसे पता ( कितने दिन और कितनी रातें बाकी है )

Aman Sharma

Written by

Coping with adulthood.

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