दिखावा ?
वक़्त बेवक़्त तुम भी आना किसी रोज़। बाते अधूरी रह गई है कई तुमसे करने को
यूँ जो कही थी तुम ; प्यार नहीं दिखावा है ये महज एक , आज उसी दिखावे पे नज़्म लिखी है मेने
कभी फुर्सत हो तब आना !! साथ पढ़ेंगे !!
कि कैसे तेरे लबो की वो हँसी अभी भी बदस्तूर घायल किए है हमें
कि अब भी तम्हारी गहरी आँखों में ढूंढता हु तम्हारे जाने की वजह ! क्या सच में वो जाना सच था ? क्या महज तुम्हे वो दिखावा ही लगा था ?
किसे पता तुम क्यों गई ! मंजर तो फिलहाल ये है अभी बी ! कि जाकर भी तुम कायम हो , इस दिल की याद में कहीं
कभी आना फुर्सत में
सुनाएंगे कैसे तम्हारे गम में आंसू बहाये थे , बिना दिखावा किए।
कि कैसे अकेले अकेले खुद का सुकून किसी शायर के लफ़्ज़ों में ढूंढा था हमने
खैर
तुम शायद अब भी विश्वास ना करो ? किसे पता !
यु तो लिखने को काफी कुछ है ! कि तम्हारी आँखे जो सोने नहीं देती ! कि तुम्हारी खुसबू जो हर किसी में ढूंढता हु में ! कि तम्हारे बाद सबका आना जाना बेबाक था बस , याद दिलाने को , कि तुमसा कोइ दूजा नहीं । कि तुम्हारी आँखे जो अब भी झांकती है उस गोल काले ऐनक के पीछे से ! लगाती हो ना वो चस्मा अब भी ? किसे पता . अरसा बीत गया तम्हे देखे !
पर पीछे आँखे तम्हारे , या आगे से बुलाकर तुम्हे देखते भी तो कैसे
