नूर-ए-इश्क़

जिस्म मेरा हो पर रूह तेरी 
खुशियाँ मेरी हों पर मुस्कान तेरी ,
तेरे रूह की खुशबू का एहसास कर सकूँ 
तेरे जिस्म की जो तपन है उसे महसूस का सकूँ। 
मेरी परछाईं तेरा सहारा बने 
तेरा दर्द मेरा हिस्सा बने ,
ये फ़साना एक किस्सा बने 
और तू मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा बने।

जब दूर कहीं तेरी आवाज़ आती है 
मेरी साँसें अंदर ही थम जाती हैं ,
तू वो छाँव है जिसकी गोद में मैं बिलखता हूँ 
तू वो किताब है जिसे सीने से लिपटकर मै रखता हूँ।

मेरा इश्क़ तो एक इबादत है 
तू मेरी एक बुरी आदत है ,
हर शाम जब सूरज ढलने को आता है 
तेरे स्पर्श को जी इठलाता है । 
तेरे होठों की लाली पे दिल ठहर सा जाता है
तेरे पास आने से ये लम्हा रुक सा जाता है, 
तेरे यौवन का तेज़ और तेरेअँगों के तीर मुझे घायल करते है 
हुस्न की ये हुंकार कुछ कायल सा करती है।

तेरे चेहरे का गोलाकार 
तेरी काली और बड़ी आँखें ,
और तेरी लटों से खेलना मुझे बहुत पसंद है 
तू वो समंदर है जो कभी शांत नहीं रह सकता ,
और मेरा मन वो नदी जो तुझमे समाना चाहता है। 
तू मशहूर है मेरे जिस्म के भीतर ,
तू वो पूर्णिमा है जिसके उजाले में मोह पाकर
मैं हरदम यूँही रहना चाहता हूँ ,
एक गुज़ारिश है की तू बस यूँहीं रहना ,
क्योंकि तू एक ख्वाब है जिसे मैं 
हरदम जीना चाहता हूँ ॥

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