कुछ कहती हैं ये किताबें

पुस्तकालय का दृश्य है 
कुर्सियां बिछी हुई थी और अलमारी खड़ी ,
थोड़ी सी भीड़ थी पर सब शांत थे 
सबके हाथों में किताब और कलम थी|
पर कुछ हलचल सी हो रही थी उन अलमारियों में 
एक घमासान युद्ध सा छिड़ा हुआ था उन किताबों में ,
कुछ दबी हुई थी एक दूसरे में 
ढेर सा लगा था ,सब ज्ञान बाटने को तैयार थीं| 
चाहे छोटी हो या बड़ी मोटी या पतली 
सब अपने महत्त्व को परस्पर कर रही थी ,
इतना कुछ लिखा था उनके पन्नों में 
सबकी अपनी एक कहानी थी |
चीखें आ रही थी किताबों की 
कुछ कुछ के तो तजुर्बे उनके पन्ने देख कर ही पता लग रहे थे,
 तभी एक व्यक्ति किताबों पर कपड़ों की फटकार लगता निकलता है ,
और घोर सन्नाटा च जाता है ,सब चुप 
तभी नीचे लगी एक सेल्फ में से एक किताब कहती है ,
अर्सों हो गए यहीं पे हूँ 
किसी के काम आती हूँ और किसी के नहीं |
जब यहाँ आई थी सफ़ेद और करारे पन्ने थे 
पर अब तो इतना वक़्त हो गया है की पन्ने भी पीले पड़ गए हैं,
किताबें तो बदलतीं ही रहती हैं इस पुस्तकालय में 
पर मै आज भी यहीं हूँ ,बस एक ही मक़सद था
कुछ सिखा सकूँ और सिखाया भी 
की जबतक इस दुनिया को तुम्हारी ज़रुरत है काम आओगे 
वरना कबाड़ के भाव बिक जाओगे||

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