यूँ खोया बचपन

एक भीनी सी मुस्कान खिलखिला रही थी
 उस नन्हे से चेहरे पे ,
मानो नभ अम्बर चूमने को जी चाह रहा था उसका 
पंख फहरा रहे थे उसके|
जैसे गगन नापने की तैयारी हो 
बरस हो गए उसे बीते हुए ,
आज कहीं ठिठुरा बैठा है 
कहीं एकांत काल कोठरी में |
बदल गए वो दिन जब मृदंग बजती थी 
आँगन सज उठता थे ,
मेले होते थे ,जलसा होता था 
आसमान में गुलाल और ढोलक की ताल पे रंगीन समा बांध उठा था 
टोलियां होती थी, खेल होता था |
उन किताबों में पढ़ी कहानी और बचपन में मेल न होता था 
बीत गए वो दिन जब ज़िन्दगी बचपन हर लम्हा खिलौना ॥

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