इतनी रात को. भड़ास निकाली है

कोई कई….. बाते. केह के राहत सी मिली है

शायद सिर्फ कहने कि ज़रुरत थी, उन्हें इन्हें सुनने कि नहीं |

उनकी तस्वीर से बाते करता ही रहता है

कभी कभी मन जस्बाती हो जाता है….

ये सारी बाते उनसे कह जाता है

कहने के बाद, सिर्फ इतना समझ आता है कि

माज़रा ये नहीं कि उनसे शिकायते क्या है

मसला ये है कि वो इतने करीब महसूस होते है कि

उनकी ज़रा सी दूरी जैसे कर रही हो नज़र अंदाज़ हमें

ये समझना मुश्किल हो जाता है कि हम खुद को समझाए कैसे

कि वो क्यों नहीं समझते कि “ जिक्रर हमारे सिवा किसी और का भी क्यों है”

हम ये सोचे भी क्यों, है क्या वजह है कि, कही और से बेमतलब से सवालों के जवाब देने है, जिक्रर अपने सवालो के. करने है |

ज़िन्दगी में मज़े अब है नहीं, ये बाते हमसे छोड़ किसी औरे से कहने क्यों है |

ये सवालों कि भड़ास हम कहे भी तो उनसे क्यों, जब समझने के फासले बढ़ गए हो |

पर कर जाते है हम बाते इतनी कि कही आये बाते उनको भी समझ

देते क्यों है वो वजह हमें कि कहे हम बाते इतनी सारी, जब हो सकती है बाते बिन कहे हमारी …. मन कि मन से हमारी |

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