सनातन धर्म का वर्तमान स्वरूप

कक्षा 1 में कितना रहना चाहिये? एक साल। कक्षा दो में कितना रहना चाहिये? एक ही साल। यदि एक क्लास की पढाई पूरी हो गयी है, काफी कुछ समझ में आ गया है तो आगे की क्लास में बढ़ जाते हैं। आखिर ऊपर बढ़ना या कहें कि उत्थान ही जीवन का सहज स्वरुप है, जिसको विज्ञान भी कहता है क्रमिक विकास।
फिर क्यों हिन्दू धर्म, सनातन धर्म कहना ही correct है क्योंकि हिन्दू एक अपभ्रंषित शब्द है, में हम कक्षा 1 यानि मूर्ति पूजा से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं, जो कि इस धर्म की महायात्रा का केवल पहला ही पड़ाव है? सनातन धर्म मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा का ही तो दूसरा नाम है। और धर्म का मूल उद्देश्य भी आत्म खोज ही है। फिर क्यों हम सनातन धर्म के चरमबिंदुओं जैसे मीमांसा, सांख्य, वेदान्त तक नहीं पहुँच रहे हैं। क्यों हम निराकार का अनुभव नहीं ले पा रहे हैं? आदि शंकराचार्य के जन्मोत्सव पर ही हमें अद्वैतवाद क्यों याद आता है? क्यों हम अपने उन उपनिषदों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं जिनको पढ़ कर पश्चिम का महान दार्शनिक Schopenhauer उनको सर पे रख कर नाचने लगा था? लोगों ने उससे पूछा कि इसमें नाचने वाली क्या बात हो गयी तो वो बोला कि उपनिषदों में वो कह दिया गया है जो कहा ही नहीं जा सकता। पर आज कितने हिन्दू उपनिषदों तक पहुँचते हैं? उनका धर्म मूर्ति पूजा से शुरू होता है और राम चरित मानस पर आकर समाप्त हो जाता है।
मान लिया कि यात्रा शुरू करने से पहले train का track पर आना जरूरी होता है, जिससे यात्रा आरम्भ हो सके। मूर्ति पूजा के माध्यम से भी धर्म यात्रा की शुरुवात हो सकती है। पर वर्तमान काल में बच्चे तो बच्चे, बूढ़े भी कक्षा 1 के मोह में ऐसे पड़ गये हैं कि पास होने को ही तैयार नहीं हैं। मूर्तियों की संख्या और आकार दोनों ही बढ़ता जा रहा है और साथ साथ ही बढ़ता जा रहा है उनके प्रति हमारा मोह। मैं मूर्तिपूजा का विरोध नहीं कर रहा हूँ क्योंकि जैसे ईश्वर सर्वत्र है तो वो मूर्ति में भी है। पर धर्म केवल मूर्तिपूजा नहीं है।
ये वो युग है जब सनातन धर्म ब्राह्मणों और ऋषियों के ज्ञानमंडल से निकल कर पुजारियों और महंतो के हाथ में पड़ गया है और इन्होनें भी हमें इसी मूर्ति और कर्म कांडों में उलझा कर आगे बढ़ने के रास्ते बाधित कर दिये हैं। क्योंकि आप मूर्ति पूजा से ऊपर उठोगे तो ज्ञान के प्रकाश से आपकी आँखें खुलती चली जायेगी और फिर इनकी दुकाने चलना मुश्किल हो जायेंगी।
जो महान धर्म हमें अनंत यात्रा का बोध कराता हो, जो हमें सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त करता हो, जो भविष्य का विश्वधर्म बनने का सामर्थ्य रखता हो और तो और जो मोक्ष जैसा विलक्षण concept अपने में समाये हो, वहां हम यात्रा के पहले पड़ाव में ही अपना जीवन व्यर्थ कर दें, ये ना तो कहीं से बुद्धिमत्तापूर्ण है और ना ही विवेकपूर्ण।
इसीलिये अब इस पर गहन विचार नितांत आवश्यक है।