और क्या बाकी हैं

जिदंगी में और क्या बाकी है?

सिर्फ थोड़ी भूख और जागती नींद,

थोडा तरस का प्यार और आधे-अधूरे सपनें,

बस मौत और उसकी आहट थोड़ी सी,

जिदंगी में और क्या बाकी है?

मेरे अंदर की कुलबुलाहट देखने के लिए भूखा पेट,

फिर मैं सोने के लिए जाग उठा

और सपनों की आस में अधूरा-सा सो गया,

आखिर मैं मृत्यु के साथ समाप्त हुआ

और मैने जिदंगी की बची-कुची यादों का,

एक बेजान गुलदस्ता दफना दिया,

जिदंगी में और क्या बाकी है?

बस थोड़े से तुम, थोड़ा सा मेरा मैं,

बस घाटा-मुनाफा थोड़ा सा,

बस खोखली ताकत और अनवरत लड़ाई थोड़ी सी,

जिदंगी में और क्या बाकी है?

ना जाने किसके पीछे मैं ताउम्र भागा

और आखिर ना जाने किससे जाके मिला

मैंने खुद-ब-खुद गिर कर,

खुद को बहुत-बहुत ऊंचा कर दिया हैं,

जो अभी तक मैं, उतना मजबूत नहीं था

अपनी हदो को लाँघकर मैं,

लड़ता गया, लड़ता गया,

जिदंगी में और क्या बाकी है?