“दिल साला बंदर”

इंसानों और बन्दरो में मुझे कोई खास फर्क दिखाई नहीं देता है, बन्दर बाहर से चंचल होते है, इंसान मन सें ,
यूँ तो, मैं काफी सीधा -साधा, पतला-दुबला, average student था, लेकिन इस चंचल वानर मन में खुराफातें चलती रहती थी। College के second year में हम से personally feedback माँगा गया college की facilities के बारे में, खैर पूरा तो याद नहीं, पर शायद यूँ लिखा था -
“यूँ तो आपको भी मालूम हैं कि हमारे Department की Building under construction में है और आस-पास के जंगलों के बंदरों की आवाजाही यूँ है जैसे सरकारी दफ्तर में सरकारी बाबू, मनमौजी आना, मनमौजी जाना।
हालांकि बंदरों के अचानक कहीं भी भगवान की तरह प्रकट हो जानें से लोगों में खौफ है लेकिन इसके अपने फ़ायदे भी है।
हम सब मोटे-मोटे Assignments, पकाऊ lectures, tutorials, CTs फलाना-ठिमकाना के खौफ में गमजदा है लेकिन जब मास्टरों को भी कभी-कभी बंदरों के खौफ में देख लेते हैं तो दिल को एक ठंडा सा सुकून मिलता है, और होंठों पे एक प्यारी सीं मुसकान दस्तक दे जातीं है, अाखिर खौफ क्या है इनको भी तो पता चलें।
कई सुंदर-सुदंर sexy sexy लड़कियों के हटटे-कट्टे Macho looking boyfriend बन गए हैं, you know security issues! लेकिन इस सुखद वातावरण की मंगल वेला में भी हम जैसे दुबले-पतले लडके अकेले रह गए है, यैर हमें अपने गम सें ज्यादा अपने भाइयों के लिए खुशी है।
शायद बहुत सें students ये कहना चाहते थे पर कभी कह नही पाएँ लेकिन बंदरों ने ये Prove कर के बतला दिया है that classroom is just a shit-pot, nothing much more!
इन ढेर सारे फायदों के अलावा चंद शिकायतें भी है,
क्या आप बंदरों से भी ये मोटी-मोटी वसूल रहें है, जो आप हमारे माँ-बाप सें हमारे Engineers बनने के एवज़ में चूस रहें है। इस बार जब मैं छुट्टियों के बाद जब घर सें कालेज आने के लिए निकल रहा था, तो दो लोगों ने हालांकि मुहँ सें तो कुछ भी नहीं कहा लेकिन उनकी आंखों ने बहुत कुछ कह डाला, पहली मेरी माँ, जो ये पुछ रहीं थीं कि अब वापस कब मेरी छुट्टियाँ पड़ेगी,
दुसरा मेरा कुत्ता Shadow, अपनी मोटी-मोटी काली-काली आँखें फाड़ के यूँ देख रहा था, मानो पुछ रहा हो, क्या तुम इंसान ही Engineer बन सकते हो, हम जानवरों के साथ एेसी ना-इंसाफी क्यों???
इन बंदरों को देख के, उम्मीद की एक किरन जगीं हैं, शायद Animal quota नाम की कोई चीज हो, जिससे Shadow के अरमानों को परवाज़ मिल सके, तो जरूर बताइएगा।
सधन्यवाद ।।”
मुझे लगा ये Feedback रोज के बासी पेपर की तरह रद्दी में जाएगा, लेकिन हुआ इसका बिलकुल उलट। तकरीबन १० दिनों बाद मुझे Director Office बुलाया गया, नाम तो उसका याद नहीं, पर रहडदो उसे बुलाते थे।
He- What is this?
Me- What Sir!
He- देखो
मैने Feedback Book देखीं, फिर Director का चेहरा देखा, फिर दुबारा Feedback Book देख के वापस उसका चेहरा देखा, खामोशी पसर गयीं, सन्नाटा ही सन्नाटा।
He- क्या है ये सब?
Me- Sir, बस एेसे ही लिख दिया
He- तो राइटर बनना है तुमको, Noble Prize चाहिए?
Me- नहीं सर
फिर एक लम्बे से लेक्चर, करारी बेइज्जती और मेरे चुपचाप मेमने की तरह जी-हजूरी के बाद लास्ट मे उसनें एक लाइन कहीं थीं, जो जहन में आज भी जिंदा है।
“अगर लिखने का इतना शौक़ है तो Engineer नहीं, राइटर बन जाओ!”
यैर Engineering Complete हुई, और आज इस लेख के माध्यम से, राइटिंग की दुनिया में नन्हे कदम बढाये है शायद इस उम्मीद से कि एक दिन उसके वो शब्द और मेरा ख्वाब मुकम्मल मुकाम हासिल कर सके।
