*ऋतु बदली करुणा मुस्कायी*

स्वाॅस-सिद्धि की अनुकम्पा पर, भित्ति गिरी वेदना सिरायी।
व्याप्ति चतुर्दिक रही गगन की, ऋतु बदली करुणा मुस्कायी।।१।।

चेतन के परिबद्धक तल सब, 
धू-धू जलकर लुप्त हुए।
अकट कामना से परिमोहित, 
चिर संस्कार विलुप्त हुए।
कर्तक संज्ञा के अभिवाहन पर, अनजानी धारा धायी।
व्याप्ति चतुर्दिक रही गगन की, ऋतु बदली करुणा मुस्कायी।।२।।

जग जाने की प्रतिभिज्ञा में,
नेत्र हुए मुकुलित सायास।
बाहर सें लग रहे उनींदे, 
अंतर्लोक गहे अभ्यास।
जड़ता का कुछ चिन्ह नहीं है, लो! यह इक विरली गति पायी।
व्याप्ति चतुर्दिक रही गगन की, ऋतु बदली करुणा मुस्कायी।।३।।

कर्मकांड लो! छूट गये सब,
मध्यम गति में मिली प्रतिष्ठा।
पग हल्के से होकर दौड़ें,
किसके हित होवे कुछ निष्ठा?
दोनों हाथ उलीचें वैभव, भेद गुह्य, कैसी निधि पायी।
व्याप्ति चतुर्दिक रही गगन की, ऋतु बदली करुणा मुस्कायी।।४।।

ठहर गये यदि कुछ पल, समझो-
मधुकर यूथ विकास करे।
अंतर्जागृति शिथिल करे जग,
विरला ही विश्वास करे।
शांतिरती, पर शब्द फूटते, वेदमुखी वाणी कुछ भायी।
व्याप्ति चतुर्दिक रही गगन की, ऋतु बदली करुणा मुस्कायी।।५।।

'सत्यवीर' यह वर्णपार गति,
हो अनुभूति, समझ तब आये।
आयुनाश का चक्र फेंक कर, 
ठगिनी तो सबको भटकाये।
घर छूटे, टूटे सब नाते, गोरी में सुहागमति आयी।
व्याप्ति चतुर्दिक रहे गगन की,ऋतु बदली करुणा मुस्कायी।।६।।

(पुस्तक - पथ को मोड़ देख निज पिय को )

One clap, two clap, three clap, forty?

By clapping more or less, you can signal to us which stories really stand out.