*कल अच्छा भी हो सकता है*

जीवन की बहुरंगी धारा,
कठिन काल की दुर्धर कारा।
परिवर्तन चक्रीय प्रकृति का,
कल तो कुछ भी हो सकता है, कल अच्छा भी हो सकता है।।१।।

दुनिया में अन्याय देखकर,
औ अपनी गति सहज पेखकर,
मेहनत से क्यों घबराते हो,
फल अच्छा भी हो सकता है,
कल अच्छा भी हो सकता है।।२।।

प्रेम परीक्षा में हो असफल,
क्यों खोते हो मन का संबल?
कितने भी दिल टूट चुके हों,
प्रेम बीज तू बो सकता है, कल भी अच्छा हो सकता है।।३।।

लाख-लाख टूटीं आशाऐं,
घायल हुईं कई इच्छाऐं,
तुमसे छल जितना भी हो ले,
तू तो निश्चल हो सकता है, कल अच्छा भी हो सकता है।।४।।

सत्यवीर खुद संभलो कितना,
क्षोभ मिलेगा जग में उतना।
मैले हों चाहे जितने मन,
फिर मन निर्मल हो सकता है, कल अच्छा भी हो सकता है।।५।।

☆ अशोक सिंह सत्यवीर 
(पुस्तक -- स्वर लहरी यह नयी-नयी है )

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