☆ प्रथम मिलन को याद करो ☆

बढ़ी निकटता, कटुक द्वंद्व कुछ उभरे तब भी धैर्य धरो।
प्रेम लगे जब-जब भी दुर्बल, प्रथम मिलन को याद करो।।१।।

प्रथम मिलन की वह आकुलता,
मीत न छूटे हृदय पुकारे।
नव भविष्य की मधुर कल्पना-
में जब खोते प्राण हमारे।

उन भावों की सुनकर आहट, पुन: मधुरतम भाव भरो।
प्रेम लगे जब-जब भी दुर्बल, प्रथम मिलन को याद करो ।।२।।

जब भी प्रेम गहनतर होता,
कुछ शंकाऐं बल पायें।
दो के मध्य तीसरा देखे,
हृदय हमारा घबराऐ।

ऐसे में मन को समझाकर, मीठी यादों में बिहरो। प्रेम लगे जब-जब भी दुर्बल, प्रथम मिलन को याद करो।।३।।

बढ़ता स्नेह अचानक भरता,
प्रबल अपेक्षाओं के तान।
मीत कैद हो जाये पूरा,
इच्छा से आकुल हों प्राण।

हल्की चोट हृदय पर पड़ती, फिर से तनिक विचार करो।
प्रेम लगे जब-जब भी दुर्बल, प्रथम मिलन को याद करो ।।४।।

एक समय ऐसा आता है,
हर बातें जब उल्टी लगतीं।
आहत अहंकार से मन में,
प्रतिरोधी भावना सुलगती।

ऐसे में पगलाये मन को, चुप करने का यत्न करो। प्रेम लगे जब-जब भी दुर्बल, प्रथम मिलन को याद करो ।।५।।

सत्यवीर आश्चर्य हो रहा,
जीने की कसमें हैं टूटी।
धीरज खुद में रहा न कुछ भी,
और कह रहे किस्मत फूटी।

ऐसे में भी शांत रहो औ शुभ भावों से प्यार करो। प्रेम लगे जब-जब भी दुर्बल, प्रथम मिलन को याद करो।।६।।

करने में त्रुटि हो सकती है,

स्वतः घटित हो तो दे फल।

प्रेम करेंगे तो टूटेगा,

स्वतः हुआ तो है निश्चल।

हानि-लाभ को भूल दुआ दो, अब कुछ तो बलिदान करो।

प्रेम लगे जब-जब भी दुर्बल, प्रथम मिलन को याद करो ।।७।।

☆ अशोक सिंह सत्यवीर

[गीत संग्रह - " लो! आखिर आया मधुमास "]

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