Aaskaran Dhingra
Sep 4, 2018 · 2 min read

शिक्षक की दुर्गति

राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों द्वारा जो महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जाती है, उसके सम्मान में भारत सरकार प्रतिवर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाती है। शिक्षकों के हाथ मैं राष्ट्र निर्माण की महान ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है और शिक्षक इसे पूरी इम्मानदारी से निभा रहे है, कुछ शिक्षकों को छोड़ कर।

बच्चे राष्ट्र का धन है, यही बच्चे भविष्य के नागरिक है और इन्हीं पर भारत की गरिमा निर्भर है। बच्चे के चरित्र निर्माण का कार्य माता पिता के पश्चात् गुरु/शिक्षक पर आता है।

परंतु आज के शिक्षक की क्या दुर्दशा है, बह किसी से छिपी नहीं है। कड़ी मेहनत करके पर्याप्त शिक्षा प्राप्त करके एक युवक शिक्षक बनता है और अपने अथक परिश्रम के द्वारा भारत के भविष्य की नींव रखता है। बच्चे को सही शिक्षा देने में उससे जितना परिश्रम हो पाता है वो करता है, परंतु इसके विपरीत उसे कितना। वेतन. मिलता है यह समाज को भली भाती ज्ञात है। इसी कारण आज का युवक शिक्षक बनाने का प्रयास नहीं करते। जो प्रयास करते है, या शिक्षक बने हुए है वो बेरोज़गारी के शिकार है, या फिर. बहुत. कम बेतन पाते है।

प्राइमरी व नर्सरी शिक्षकों का शोषण अत्यधिक हो रहा है, प्राइवट स्कूल इन शिक्षकों से प्रातः से शाम तक अथक परिश्रम करवा कर लगभग रुपये 3000/- से 6000/- प्रति माह वेतन देते है, लेकिन बेतन रेजिस्टर मैं वेतन रुपये 10000/- से 15000/- पर हस्ताक्षर करवाते है। मैं यहाँ स्कूल के नाम नहीं ले सकता, लेकिन ये शिक्षक अपने परिवार के पालन पोषण या यूँ कहे इस स्थिति को मरता क्या ना करता या अपना भाग्य समझ कर चुप्पी साध लेते है।

मीडिया भी इस पर ध्यान देना उचित नहीं समझती और सरकार भी कोई ठोस क़दम नहीं उठा रही है। सरकारी स्कूल में शिक्षकों के बहुत स्थान रिक्त है, परंतु इस और कोई ध्यान नहीं दे रहा।

मीडिया को चाहिए कि वो इन विद्यालयों का स्टिंग ऑपरेशन करवाके ऐसे विद्यालय की पोल खोले तथा उनको दण्डित करवाये और इस प्रकार के छोटे शिक्षकों के आर्थिक शोषण को जड से उखाड़ फेंके। ऐसे करने से इन प्रकार के शिक्षकों का कुछ तो उद्धार होगा और मीडिया कर्मियों को उनका आशीर्वाद दुआए मिलेगी।

यह लेख एक भुगतभोगी शिक्षक के निजी अनुभव के आधार पर लिखा गया है। वो एक विद्यालय से दूसरे विद्यालय मे भटकता रहा, परंतु उसको उसकी योग्यता के अनुसार वेतन नहीं मिला।