वह ख़ुद से मिला नहीं

दुनिया से मिलते मिलते खो गया कहीं 
शायद तभी उस शाम 
वह तुमसे मिला नहीं

मुखौटों की दुनिया करती है शिकायत 
की वह शख़्स ज़रा ख़ामोश था 
शायद दिल से आज मिला नहीं

पर ख़ामोश रहकर, न मुस्कुरा कर 
जो पुकारा था तुमको 
शायद तुमने सुना नहीं

हंसी के तराज़ू में रख दी शख़्सियत उसकी 
पर खैर, छोड़ कर खुदको 
किसी से कोई गिला नहीं

कैसे आए वह तुमसे मुलाकात के लिए 
अब तो हुआ इक अर्सा 
की वह ख़ुद से मिला नहीं 
- ‘राहगीर’

This was inspired from:

उस शाम जब तुम मिले थे 
ज़रा परेशान से
ज़रा ख़ामोश से और उदास भी
वो तुम नही थे न...
हाँ वो तुम तो नही थे..
तुम होते तो हर बात पर चहक जाते
तुम होते तो बिना बात हि कितना खिलखिलाते
तुम होते तो जाने क्या क्या कहते
फिर निहारते हुये मुझे सुनते..
मै भी कहते कहते तुम्हारे देखने के अंदाज़ से शरमा के चुप हो जाती
और तुम हंस पड़ते
मानो किसी बच्चे को खेल में जीत मिल गयी,
हाँ मैं हार ही जाती थी
हर बार खुद को तुमसे..
पर इस बार बात करते रहकर जीतना अच्छा नही लगा..
तुमसे मिलना मुझे खुदसे मिलना नही लगा..
तो सुनो ! एक काम करना , ज़रा हमसे कल " तुम" मुलाक़ात करना ..
क्योंकि उस दिन तुम मिले नही थे..
ठाकुर प्रकृति सिंह
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