मैं गाँधी को नहीं जानता
Manish Gupta
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अद्भुत लेख Manish, मैं जानता हूँ गाँधी को हाँ मैं जनाब| जबसे होश संभाला है सिर्फ एक गाँधी को ही तो देखा है , सुना है, जलाया है , कुचला है| मैं जानता हूँ उसे एक सड़क की तरह जो उसी तरह से दिशाहीन है जैसे बापू के वचन आज कल के परिपेक्ष में, एक उधान की तरह जहाँ क्यारियां तो हैं पर फूल नहीं है , चौराहे पे लगी एक मूर्ति की तरह जो बोल नहीं सकती बस रोती है, लोकतांत्रिक राजनीति के एक हथियार की तरह जिसका कोई ईमान नहीं है, एक लाश की तरह जिसको हम कन्धों पे धोते हुए झूठी सत्यता के वचन लेते है राम नाम सत्य है| और काहे का गाँधीवाद वो तो दफन हो गया था उसी दिन जिस दिन इस देश के विभाजन की नींव पड़ी थी, जिस दिन आदमी हिन्दू और मुसलमान बन गया था और नेता होना एक सम्मान बन गया था| सत्य के साथ मेरे प्रयोग जारी हैं सोच के बस खुश हो लेता हूँ और खुद के गाँधी जयंती पर छुट्टी के प्लान बना लेता हूँ|

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