कॉर्पोरेट एवं वर्णाश्रम व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन
जैसे शरीर की अवस्था में हर व्यक्ति पहले बालक, किशोर, युवा और फिर वयस्क, प्रौढ़ एवं वृद्ध होता है वैसे ही कर्मफल के अनुसार हर व्यक्ति जन्म-जन्मांतर में पहले शूद्र (उद्यम तंत्र), फिर वैश्य (वाणिज्य तंत्र), क्षत्रिय (शासन तंत्र) एवं ब्राह्मण (ज्ञान तंत्र) जन्म लेता है. सामजिक संतुलन के लिए प्रकृति में यह नियम है. यही क्रमबद्धता कॉर्पोरेट व्यवस्था में भी देखा जाता है — मजदूर, प्रबंधक, निदेशक, नीति निर्धारक. इसी तरह से ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास आश्रमों की भी क्रमबद्धता है.
जैसे बालकों पर अधिक बंधन नहीं होते वैसे ही गुरुकुल ब्रह्मचर्य का कड़ा अनुशासन वैश्य जीवन से शुरू होता है. वानप्रस्थ का उससे भी कठोर जीवन क्षत्रिय जीवन के तीसरे चरण से ही शुरू होता है. संन्यास का उससे भी कठोर जीवन ब्राह्मण जीवन के चौथे चरण से शुरू होता है. हर वर्ण एवं आश्रम के अधिकार एवं दायित्व क्षेत्र तय किये जाते हैं. जैसे कि कॉर्पोरेट में entitlements and rights होते हैं और roles and responsibilities भी.
वर्ण संकर अपवाद होता है, नियम से नहीं होता। आधुनिक जेनेटिक साइंस भी इस तथ्य की पुष्टि करता है. अपितु वर्ण संकर होने पर भी किसी भी स्थिति में कर्म संकर होने पर जैसे कॉर्पोरेट में दायित्व क्षेत्र एवं अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करने पर एग्जिट पालिसी होती है, वैसे ही वर्णाश्रम से निष्कासित व्यक्ति को चांडाल की श्रेणी में डाला जाता है और उचित प्रायश्चित के बाद ही उसे वापस लिया जाता है. इसी तरह से कॉर्पोरेट की रिटायरमेंट पालिसी एवं पेंशन के स्थान पर हमारी व्यवस्था में वानप्रस्थ एवं संन्यास के लिए अरण्य क्षेत्र का बाहुल्य होता है एवं उन्हें संरक्षित रखा जाता है. गुरुकुल भी अरण्य में होते हैं जैसे कि आज विश्व के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संसथान फारेस्ट कैंपस यानी अभयारण्य में होते हैं.
शूद्र यानी उद्यमी का शूद्र रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अपनी अपूर्वता को पहचानना और उसे सहजता से स्वीकार कर कर्त्तव्य का पालन करना ही धर्म है. यदि हर कोई ब्राह्मण बन जाए तो फिर क्या सामाजिक व्यवस्था चलेगी? जैसे कॉर्पोरेट व्यवस्था में हर कोई एक ही समय में चेयरमैन या सीईओ तो नहीं हो सकता।
वर्णाश्रम एवं कॉर्पोरेट व्यवस्था में मौलिक फर्क इतना है कि कॉर्पोरेट सिर्फ अर्थ-व्यवस्था तक सीमित रहता है और उद्यम तंत्र एवं वाणिज्य तंत्र से सरोकार रखता है और सीमित अवधि के कॉन्ट्रैक्ट से चलता है वहीँ वर्णाश्रम व्यवस्था मनाव समाज के समस्त तंत्रों की समग्र व्यवस्था है जिसमें समष्टि-व्यष्टि का एकात्म भाव निहित है जहां जन्म-जन्मांतर एवं लोक-परलोक तक का ध्यान रखा जाता है.
आधुनिक व्यवस्था में सबसे बड़ी कमी यह है कि जहां वर्णाश्रम व्यवस्था में समाज उद्यम तंत्र एवं वाणिज्य तंत्र को नियंत्रित करता था वहीँ कॉर्पोरेट व्यवस्था छल-कपट से बड़े कारखाने और अधिनियमित पूँजी (fiat money ) के माध्यम से शासन तंत्र (सरकार) और ज्ञान तंत्र (शिक्षा, नीति, धर्म) को अपनी गिरफ्त में रखकर समाज को नियंत्रित कर रहा है. इसका आत्मघाती एवं विनाशकारी परिणाम भारत ही नहीं पूरे विश्व में देखा जा रहा है. कैपिटलिस्ट सिस्टम का वास्तविक विकल्प बड़े कारखाने और अधिनियमित पूँजी पर ही आधारित कम्युनिज्म नहीं है, अपितु वर्णाश्रम व्यवस्था ही है. पिछले शतक के अनुभव से यह स्पष्ट है कि कैपिटलिज्म और कम्युनिज्म दोनों ही शोषणकारी एवं विनाशकारी व्यवस्था है. विश्व के प्रसिद्द विचारक नोआम चोम्स्की भी यह मानते हैं कि इंडिजेनस यानी हिन्दू जीवन पद्धति से ही पर्यावरण संकट से मानव जाति के विनाश को रोक पाने में सक्षम है. इसकी पुष्टि संयुक्त राष्ट्र के हिन्दू घोषणा पत्र २००७ में की गयी है जिसमें भारत समेत विश्व के सभी देशों ने सर्वसम्मति से समर्थन किया है.