पशुओं में लंगड़िया रोग (ब्लैक क्वार्टर)

दुधारू पशुओं को पालने में जो सबसे बड़ी समस्या आती है वो है पशुओं में होने वाली बीमारियाँ। उनकी देखभाल करना जरुरी है यदि एक पशु में कोई बीमारी हो जात है तो दुसरे पशु भी इसका शिकार होने लगते है। यदि इनकी गौर न की जाए तो बीमारी के कारण पशु बीमार रहने लगते है कुछ बीमारी इतनी भयानक होती है कि दुधारू पशुओं की मृत्यु तक हो जाती है। इन बिमारियों में मुख्य रूप से गलाघोटू, मुंहपका-खुरपका और लंगड़ा बुखार मुख्य है। लंगड़ा बुखार एक जानलेवा बीमारी है यदि पशु इसकी चपेट में आ जाए और समय पर उसकी देखभाल न हो तो उसकी मृत्यु तक हो जाती है। आज हम आपको इस बीमारी के लक्षणों और इसके इलाज के विषय में कुछ अवश्य जानकारी उपलब्ध करा रहे है।

1) यह रोग क्या है?

पशुओं में लंगड़िया रोग (ब्लैक क्वार्टर) एक घातक संक्रामक रोग है, जो कि पशुओं में अतिविषाक्ता एवं माँसपेशियों की सूजन आदि लक्षणों के रूप में प्रकट होता है। भारत देश में कई जगह इस रोग को स्थानीय भाषाओं में लँगड़ा बुखार, टाँगिया रोग एवं फरया इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। यह रोग मुख्य रूप से दुनियां में उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले देशों में ज्यादा देखने को मिलता है। बरसात एवं बरसात के तुरंत बाद के मौसम में यह रोग अधिक देखने को मिलता है। भारत में यह रोग दक्षिणी राज्यों (तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश एवं तेलंगाना) में ज्यादा पाया जाता है। कई बार तो इन क्षेत्रों में यह रोग महामारी के रूप में देखने को भी मिल सकता है। गाय, भैंस, भेड़ एवं बकरियों में यह रोग अधिक पच्र लित हैं तथा 6 माह से 2 वर्ष की आयु के अच्छी शारीरिक अवस्था के पशुओं यानि स्वस्थ पशुओं में यह रोग अधिक देखने को मिलता है। इस रोग को अगर समय पर उचित उपचार नहीं किया जाता है तो इसमें मृत्यु दर बहुत अधिक होती है। बहुत ही कम संभावना के साथ यह रोग सुअर प्रजाति के पशुओं में भी कभी-कभी देखने को मिल सकता है।

2) यह रोग होता कैसे है?

पशुओं में लंगड़िया रोग क्लोस्ट्रिडियम चैवियाई नामक जीवाणु के संक्रमण की वजह से होता है। यह एक मृदा जन्म रोग है, जो इस रोग के जीवाणु द्वारा प्रदूषित चारा-पानी खाने तथा बाल/ऊन एवं पूँछ काटने के समय हुए घावों के संक्रमण से हो सकता है। यह एक छुआछूत का रोग नहीं है। इस रोग का जीवाणु विपरीत परिस्थितियों में स्पोर के रूप में प्रकट हो जाता है, तथा इस रूप में मिटटी एवं वातावरण में सालों तक बिना नष्ट हुए रह सकता है जो कि पशुओं में संक्रमण का कारण बनता है। इस रोग से प्रभावित होकर मरे हुए पशु को अगर उचित तरीके से जलाया या दबाया नहीं जाता है तो वो भी मिटटी एवं वातारण में इस रोग के जीवाणुओं को फैलाने का काम करता है, जो कि अन्य स्वस्थ पशुओं के लिए खतरा हो सकता है। पशुओं में आपस में लड़ाई के दौरान सींगों से हुए घाव, किसी नुकिली वस्तु से हुए घाव/चोट तथा बधियाकरण, बाल/ऊन काटने, ब्याने, जेर निकालने एवं पूंछ काटने के दौरान होने वाले घावों पर मिटटी लगने से भी इस रोग के होने की संभावनाएं ज्यादा होती है। कई बार पशुओं में इंजैक्शन या टीका लगाने के दौरान पुरानी या मिट्टी लगी हुई सुई का इस्तेमाल करने से भी इस रोग के होने की संभावना रहती है। इस रोग के होने के लिए पशु को मांसपेशियों में घावों का गहरा होना बहुत जरूरी है, हल्के तथा ऊपरी सतह के घावों से इस रोग के जीवाणुओं का संक्रमण होने की संभावना कम होती है। अतः यह रोग 6 माह से 2 वर्ष की आयु के पशुओं में जिनकी शारीरिक अवस्था अच्छी होती है तथा जिनको मांसपेशियां अच्छी तरह विसरित होती है, उनमें होने वाले गहरे घाव/चोट की वजह से ज्यादा देखने को मिलता है।

3) इस रोग के लक्षण क्या-क्या हैं?

इस रोग के जीवाणुओं के शरीर में प्रवेश करने, बाद में 2 से 5 दिन में पशु में रोग के लक्षण दिखाई देने शुरू हो जाते हैं। प्रभावित पशुओं में भूख की कमी मानसिक अवसाद एवं सुस्ती देखने को मिलती है। पशु के शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ा हुआ (106–108 डिग्री फैरनहीट) पाया जाता है। पशु के हृदय गति एवं श्वसन दर बढ़ जाती है। प्रभावित पशुओं के कन्धों, गर्दन, पुट्ठों के अतिरिक्त वक्ष, जंघाओं एवं पिछले हिस्सों को मांसपेशियों में सूजन देखने को मिलती है तथा इन स्थानों पर पशु भी हाथ से छूने पर गर्म और दबाने पर दर्द देखने को मिलता है। पशु के शरीर की प्रभावित मांसपेशियों में गैंस भरने की वजह से इन हिस्सों को दबाने पर चरचराहट की आवाज सुनाई देती है। पशु के शरीर के प्रभावित हिस्सों का रंग गहरे काले रंग का दिखाई देता है तथा इन जगहों पर सुई से छेद करने या चीरा लगाने पर गैंस निकलती है। पशुओं के पैरों की मांसपेशियों के प्रभावित होने पर पशु लंगड़ा होकर चलता है, कई बार पशुओं के पूरे शरीर में त्वचा के नीचे गैंस भर जाती है एवं कहीं पर भी दबाने से चरचराहट की आवाज आती है। कुछ समय पश्चात प्रभावित मांसपेशियों की कोशिकाओं के मृृत होने की वजह से तापमान सामान्य से भी कम हो जाता है एवं दर्द होना भी बन्द हो जाता है, तथा पशु की 12 से 48 घण्टों के उपरान्त मृृत्यु भी हो सकती है। इन सबके अतिरिक्त इस रोग से अति प्रभावित पशु की 24 घंटे के भीतर बिना कोई लक्षण दिखाई भी मृृत्यु हो सकती है।

4) इस रोग की पहचान कैसे करें?

पशुपालकों को अगर अपने पशुओं में किसी भी वजह से कोई घाव होने पर एवं खासकर बरसात एवं बरसात के तुरंत बाद के समय में उपरोक्त में से कोई भी लक्षण दिखाई दें, तो ऐसे पशुओं में लंगड़िया रोग की संभावना मानकर तुरंत पशु चिकित्सक से जांच करवाकर इस रोग का पता लगाना चाहिए। इसके अतिरिक्त पशु की प्रभावित मांसपेशियों पर सुई मारने या चीरा लगाने पर गैंस के साथ निकलने वाले पानी जैसे पदार्थ को पशु रोग जाँच प्रयोगशाला में जाँच करवाकर भी इस रोग के जीवाणुओं का पता लगाया जा सकता हैं। चूंकि यह एक पशुओं का अति घातक रोग है, जिसमें मृत्युदर काफी अधिक होती है, अतः पशुपालकों को सलाह दी जाती है कि पशुओं में इस रोग के कोई भी लक्षण दिखाई देने पर देर ना करते हुए तुरंत अपने पशु चिकित्सक से उपचार करवाएं।

5) इस रोग का उपचार क्या है?

पशुपालक इस रोग से प्रभावित अपने पशु का जितना जल्दी हो सके पशु चिकित्सक से ईलाज शुरू करवा दे एवं पुरा ईलाज करवाएं। पैनीसीलीन नामक एंटीबायोटीक का प्रयोग इस रोग में अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। इस एंटीबायोटीक को पशु की प्रभावित मांसपेशियों में सीधा लगाने पर भी फायदा मिलता है। पशु चिकित्सक द्वारा दी जाने वाली एंटीबायोटीक एवं अन्य दवाइयों के अतिरिक्त इस रोग में सहायक चिकित्सा के रूप में लीवर टाॅनिक, विटामीन-बी, आदि से पूरित संतुलित आहार का प्रयोग शीघ्र स्वास्थ लाभ के लिए उपयोगी है। उपचार के अलावा प्रभावित पशु को अन्य पशुओं से अलग कर देना चाहिए।

6) इस रोग की रोकथाम कैसे करें?

पशुपालक अपने पशुओं को इस रोग से बचाने के लिए निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं-

  • लंगड़िया बुखार से मृत पशु का शरीर इस रोग के जीवाणुओं को मिट्टी एवं वातावरण में फैलाने के लिए जिम्मेदार होता है। अतः इस रोग से मृत पशु के शरीर को पशु चिकित्सक की सलाह लेकर उचित तरीके से जला या दबा देना चाहिए।
  • ऐसे क्षेत्र जहाँ इस रोग के जीवाणु होने की संभावना ज्यादा होती है, वहां पर पशुओं (खासकर 6 माह से 2 वर्ष की आयु) को नहीं जाने देना चाहिए। स इस रोग से मृत पशु को जलाने या दबाने से पहले उसकी खाल को बिल्कुल नहीं उतारना चाहिए। यानि मतृ शरीर को खाल के साथ ही जला या दबा देना चाहिए।
  • पशुपालकों को अपने पशुओं को किसी भी तरह की चाटे लगने से बचाना चाहिए। अगर चाटे लग भी जाए या घाव हो जाए तो उसके मिटटी नहीं लगने देनी चाहिए एवं पशु चिकित्सक से ऐसे घाव का इलाज करवाना चाहिए।
  • पशुओं को कोई भी दवाई देने या टीकाकरण के लिए तथा अलग-अलग पशुओं के लिए अलग नई सूई का प्रयोग करना चाहिए।
  • पशुपालकों द्वारा पशु बाड़े की स्वच्छता तथा स्वच्छ एवं शुद्ध आहार का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
  • चूना (10 प्रतिशत), फिनाईल (5 प्रतिशत) या फाॅर्मलिन (2–4 प्रतिशत) से बाढ़े का कीटानशन कर सकते हैं।

पशुओं में इस रोग की रोकथाम के लिए टीका भी उपलब्ध है। पशुपालक अपने 4–6 माह की आयु के पशुओं का पशु-चिकित्सक की सलाह लेकर अप्रैल-जून (खासकर बरसात से पहले) की अवधि में प्रतिवर्ष टीकाकरण करवा सकते हैं।

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    डेरी ज्ञान एक सामाजिक पहल है जिसका उद्देश्य सिर्फ एक ही है । भारत मे फिर एक टेक्नोलॉजी से जुडी दूध क्रांति आये और हम डेरी फार्मिंग के बारे मे सीख सके । जय हिन्द

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