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राह तकत थकीं अँखियाँ 
आवे याद पुरानी बतियाँ 
खेत में उगती थीं रोटियां 
जब से पिया शहर गए हो 
घर सूना, खेत सूने, दिल सूना 
पैसे आवे न आवे पतियां 
वक़्त आज मुश्किल है 
कल उतना ही भारी था 
टूटा घर, ठन्डे चूल्हे खातिर 
गांव भी अपना काफी था 
आजा पिया अब खेत बुलाते 
बीत गयीं कितनी सदियाँ