बारिश

जो प्रेमी के नाम सी

ज़बान पर चढ़ जाती है

हम उँगलियों से आसमान को टटोलते रहते हैं

कि इस दफ़ा बरसे तो पूरा आसमान पी जाएँ.

और जब टूटके गिरते हैं कांच के मोती

समूचा आसमान जैसे त्वचा में निचुड़ आता है.


Originally published at intihajagjitsingh.blogspot.com on February 7, 2019.

    दीपशिखा वर्मा

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    याद आती होंगी न मेरी…वो दो पैसे की बातें! |||| Integrate all your skin deep conversations and they will emerge as “a Life”.