गरम केतली●

बस एक स्टेशन छूटा ही था,कि अचानक बंद आँखों ने धड़-धड़ कर चलती ट्रेन से सहम कर,खुद को नग्न कर लिया और ख़्वाबों की दुनियां से घसीटकर मुझे वर्तमान में ला पटका !

उमसभरी गर्मी में भी खिड़की के बाहर का नजारा इतना शानदार और दिलचस्प था,कि आँखों का बासीपन एक झटके में फुर्र हो गया ! अचानक साँसों में एक ताजगी सी महसूस हुई और ठंड हवाओं के झोंको ने पूरी ट्रेन को अपने आघोष में कर चारों ओर से घेर लिया,पूरा का पूरा शरीर बिजली के करेन्ट जैसा ऊपर से नीचे तक सहम के रह गया ! मौसम में इस तरह हुए अचानक बदलाव ने निशब्द बैठे लोगों को बात करने का नया विषय दे दिया ! धूप से छाव और फिर ठंडी हवाओं तक का हमारा सफर दूसरे स्टेशन पहुंचने से कुछ दूरी पहले ही पूरा हो गया ! कि तभी ट्रेन ने रुकने का इशारा किया और पहियों की रफ़्तार के साथ तेज़ दिखने वाले लोग भी धीरे-धीरे,धीरे होते चले गये !

एक परिवार भाग के आता हुआ दिखाई दिया,जैसे वो काफी देर से ट्रेन का इंतजार कर रहे थे,आखों को दबाकर बड़े गौर से खिड़की से चिपके हुए मैं उस परिवार को देखता रहा,ऐसा लग रहा था मानो जैसे वो मई जून की छुट्टियां बिता कर वापस अपने घर को रवाना हुए होगे !
कि तभी दूसरे कोने से छोटे-छोटे बच्चों के दौड़ने की आवाज सुनाई दी,मुड़कर देखने पर पता चला कि वाकई कुछ 11–13 साल के बच्चे बाल्टी में पानी के पाउच लिए दौड़े चले आ रहे थे ! उनमें से कुछ ने तो अपने हाथों में 5–5 रूपए वाले दालमोट के पैकेट भी पकड़ रखे थे, कि देखते ही देखते पूरा का पूरा काफिला ट्रेन के भीतर प्रवेश कर गया ! “भईया पानी ले लो,दालमोट-दालमोट !” की कई आवाज़े धीरे-धीरे कानों को अपने वश में करने लगी !

पेट में एक खालीपन सा महसूस हुआ,क्योंकि दिल्ली से कानपुर तक के सफर में पिछले 2 घंटो से अन्न का एक भी दाना पेट में नही गया था,उठने का तनिक भी मन न हुआ मानो पूरा का पूरा शरीर खिड़की से सटी सीट में चिपक के रह गया हो ! पांच रूपये की दालमोट और पानी के पाउच लिए वो छोटे-छोटे हाथ इधर से उधर नाच रहे थे ! जैसे ही जेब में हाथ डालकर कुछ टूटे सिक्क़े निकालकर गिनना शुरू किया, “हाँ भईया क्या चाहिए !” बोलते हुए एक लड़का करीब तक आ पहुंचा,मैंने दालमोट के 2 पैकेट और पानी का एक पाउच लेकर उसे विदा कर दिया !

कानपुर अभी भी काफी दूर था,वही लगभग 100 से 200 किलोमीटर तो होगा ही ! ट्रेन ने चलना शुरू ही किया था कि अचानक आई भीनी खुसबू ने मुझे उसमें खोने पर मजबूर कर दिया ! वो कोई उबलती चाय की खुसबू थी शायद ! एक झटके में सारी महक को अपने अंदर तक भर लिया मैंने !
मुझे समझ नही आता कि कोई इन्सान ऐसा कैसे हो सकता है कि एक उबलती चाय के लिए चलती ट्रेन से उतर जाए,थोड़ा अजीब लगता है न सुनने में !

पर सच कहूँ तो मैं वही इन्सान हूँ और इस समय मैं उसी चाय की दुकान पर बैठा हूँ,जिसने बेख़ौफ़ बिना किसी सम्बन्ध के मुझे खुद तक खीच लिया था !

“एक अहसास हुआ मैं गलत हूँ,पर हद को पार करने का मज़ा ही कुछ और था !”

उस उबलती चाय की खुसबू लगातार मुझे अपने आघोष में भरती चली जा रही थी ! “खोया मन और बुद्धू मैं” चलती ट्रेन से कब दूर हो गये कुछ पता ही न चला ! कि अचानक “लेओ बाबूजी” की आवाज़ के साथ वो हुंडे वाली चाय मेरे सामने आके खड़ी हो गयी !
मैंने झट्ट से चाय मालिक के हाथों से चाय को दबोच कर अपने हाथों में जकड़ लिया और फिर शुरू हुआ “आनंद की प्राप्ति का सिलसिला !”
सिर्फ एक चुस्की और शरीर की झनझनाहट के साथ मैं “स्वर्ग के द्वार” तक जा पहुंचा, हुंडे का स्वाद और वो नसीली अदरक वाली चाय,वाह ( एक गहरी सांस), सब फीका पड़ गया था उस चाय के सामने !

आँखे बंद हो गयी और शरीर का दर्द जैसे बस,कहीं गायब सा हो गया हो ! एक ऐसी दुनियां का आगाज हुआ,जिसका मुझे बरसों से इंतजार था !

“ ठंडी हवाओं,ढ़लती शाम,हुंडे की चाय और अकेला मैं,बस एक अधूरी किताब पूरी हो गयी हो जैसे !”

लम्बी-लम्बी साँसों के बीच वो लम्बी-लम्बी चाय की चुस्कियां,ऐसा लग रहा था मानो जैसे बरसों पुराने दर्द पर कोई मरहम लगा रहा हो ! पूरा का पूरा शरीर शून्य सा हो चला ! ठीक उसी तरह,जैसे मौत के बाद सब शांत सा हो जाता हो ! सुकून और बस सुकून,शानदार सुकून,बिछड़ी मोह्हबत मिल गयी हो जैसे !

“चुस्कियां बढ़ती गयी और आनन्द पूछो मत !”

खुली आँखों के सामने वो चलता-फिरता स्टेशन,बस रेंग रहा था,रेंग रहा था,और सिर्फ रेंग रहा था !

न जाने कितनी ट्रेने आई और न कितनी गयी,कब सुबह से शाम हो गयी कुछ पता ही न चला और मैं बैठा रह गया उसी चाय की दुकान पर,ठीक उसी जगह,उसी सीट पर !

हर एक ख्याल ताजा हो गया था आज और मैं नया !

चाय की चुस्कियों ने आज न जाने कितना कुछ बदल दिया था,“खोया मैं आज फिर वापस आ गया था !”
नई उमंगो के साथ अब मैं तैयार था कानपुर आने को और फिर 2 घंटो का सफ़र तय कर मैं उतर गया उन जानी-पहचानी कानपुर की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के बीच और याद रह गयी तो बस वो ……..

“गरम केतली” !

Author :- Dheerendra Kumar Gautam

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