“रक्त का दर्द”


20 साल का हो चला हूँ,अन्जान हूँ आज भी(खुद से,दुनियां से,समाज से,लोगों के अनकहे विचारों से और इन खुसबू देने वाली उन अनकही अन्जानी हवावों से-जो कभी कभी सिर्फ सुकून देकर चली जाती हैं! )

मां-बाप,भाई बहन,रिश्ते-नाते सब बिन कहे,बिन मांगे,बिना किसी शर्त के मिल गये !

पैदा होते ही इनसे जुड़ गया और ‘रक्त के बंधन’ में बंध गया !

सभी लोगों की तरह मैं भी इस भाग दौड़-भरी जिन्दगी का हिस्सा बन गया,सब जैसे दौड़कर कही पहुंचना चाह रहे हो !

मुझे भी समाज ने,समय ने,परिवार ने और अछूते अनचाहे विचारों ने धकेलकर भागती हुई दुनियां के साथ चलने के लिए ‘जिन्दगी’ नाम के गड्डे में धकेल दिया !
एक बार इस गड्डे में गिर जाने के बाद बड़ा ही कठिन हो जाता है इससे बाहर निकल पाना,इससे खुद को स्वतंत्र कर पाना,आजाद होने के सिर्फ ख्वाब ही काफी होते है यहाँ ! ‘म्रत्यु’ के बाद खुद-ब-खुद अलग हो जाते है-इस ‘कभी न समझ आने वाली,कभी न साथ देने वाली “बेहया”,“निर्मम” जिन्दगी से !

मैं और मेरा परिवार जिसमें दो भाई,एक बहन,मैं और माता-पिता है ।

बहुत यादें दफ्न है हर एक के दिलों में,काफी समय एक दूसरे के साथ प्यार,नफरत,लड़ाई और झगड़ें में बिता दिया,समय बीतता गया,कानों कान किसी को खबर तक न हुई !

बचपन को खुल के जिया है हम सबने साथ में और रात की वो छुपन-छुपाई तो चाहकर भी कभी वापस न आएगी,जब लाइट जाने पर मोह्हले के सारे लड़के कूद-फांद करके बाहर को आ जाते थे और सोनू,मोनू,राजा,शिखा बाहर आओ लाइट गयी भागो जल्दी आओ चिल्लाते थे !

राजा मेरे बड़े भाई का नाम है,मोनू उससे छोटे का,शिखा मेरी बहन का और सोनू का तो आप सब जानते ही है यानी कि मैं !शाम का समय हम सब छत पे ही बिताते थे !घर का छोटा था मैं और सभी का दुलारा भी !मोह्हले में मेरी स्माइल सभी भी पे हावी थी,मोह्हले की आंटियों तक को पसंद था मैं,लडकियों का तो Crush था मैं उन दिनों !

रात को 8 बजे लाइट जाने का नियम बन चुका था !लाइट जाते ही हमें बुलाई गयी आवाजों को सुनकर हम इधर-उधर छत पे पड़ी अपनी-अपनी चप्पलों को खोजते और दौड़कर अटारी से नीचे की ओर भागते थे !

“कभी-कभी तो उलटे पैर की चप्पल सीधे पैर में और सीधे पैर की चप्पल उलटे पैर में ही पहन लेते थे !”
और जैसे ही नीचे की ओर भागते अक्सर जीने में रखा गिलास,लोटा वगेरह पैर से लड़कर टन टन टन की आवाज़ करता हुआ 3–4 जीने फांद के सीधे मुंह के बल आ के गिरता था और कभी कभी तो तीसरे या चौथे जीने में अटक के रह जाता था ,चोट जित्ती तेज़ होती,लोटा उतना ही जल्दी नीचे पहुंच के छन्न की आवाज़ के साथ गोल- गोल घूम के शांत हो जाता !

लोटा,गिलास जीने में इसलिए रख दिए जाते क्योकि पुराने जमाने के हिसाब से इस घर में भी जीने के नीचे से सटी हुई नांद बनाई गयी थी छोटी से,अरे वो घर के छोटे-मोटे काम इसी सी होते थे न !इसी से रोज शाम को बाल्टी में पानी भरकर घर के बाहर डाला जाता था,और पानी डालने के बाद मिट्टी की जो भीनी खुसबू आती,काफी अंदर तक सांस खीच लेता था मैं तो उस सुगंध को सूंघने के लिए, “ भारत की मिट्टी की शायद बात ही कुछ और है !”

इधर-उधर करते हुए हम लोग बाहर पहुंच जाते,और फिर 1 घंटा छुप्पन-छुपाई और दूसरे कई खेल खेलते क्योकि 9 बजे लाइट आ जाने का भी नियम था !

मैं जब छोटा था तो याद है मुझे कंचे खेलने बहुत पसंद थे,लेकिन पिताजी को इससे शख्त नफरत थी,इसीलिए तो मैं रोज उनके 4 बजे ड्यूटी से वापस आने के पहले ही खेलकर घर आ जाता था,एक दफा तो कंचे खेलने में इतना मशगूल हो गया मैं कि 4 कब बज गये,कुछ पता ही न चला,अभी-अभी मैंने कंचे से टीप मारी ही थी कि पीछे से एक हाथ मेरी पीठ को आ टकराया,वो मेरे पिताजी का हाथ था,सीधे खीच के घर ले गये और चेतावनी दे डाली- आज के बाद कंचे खेलते देख लिया तो बहुत मारेगे,मैंने उस दिन से कंचे को हाथ तक नही लगाया आजतक लेकिन घर में मेरे जीत के रखे कंचे मुझे अक्सर वो दिन याद दिला देते है ,जब मैंने टीप मार के कंची के टुकड़े कर दिए करता था,हर बार नही,लेकिन कभी कभी तो फोड़ता था न मैं !सोच के चेहरा खिल उठता है ,वो भी क्या बचपन के दिन थे !

और भोला तो मैं बचपन से ही था ,कभी गुस्सा न करने वाला,माँ अक्सर बताती थी मुझको मेरे बारे में,एक किस्सा तो ये भी बताया कि वो मुझे एक हाथ से ही टांग लेती थी इतना हल्का था मैं और मैं एकदम गोंद की तरह उनसे चिपक भी जाता था,दूसरे हाथ में रहती थी पानी की बाल्टी हां वही लोहे वाली,अब तो लोहे की बाल्टी बनना ही बंद हो गयी है,पानी में गिरते है ही छपाक की आवाज़ आती थी जिससे और कुवे का पूरा पानी 2–2 फिट उपर तक उछल के दीवार गीली कर जाता था !

धीरे-धीरे सब बड़े होने लगे,सब का नजरिया भी बदलने लगा,समय बदल गया,परिस्थितियाँ बदल गयी,जो कभी न बदले वो थे इस घर के दिए हुए “संस्कार” ,उनसे कभी पीछा न छूट पाया हमारा !

अब वही सोनू,मोनू,राजा शिखा बड़े होके धीरेन्द्र,मनीन्द्र,पुष्पेन्द्र और कृतिका बन गये थे,स्कूल में दाखिला जब हुआ था तो इन्ही नामों ने हमारा स्वागत किया,अब हमारे दो नाम साथ चलते थे,स्कूल में दाखिले के कुछ ही दिनों के भीतर बड़े अजीब-अजीब दोस्त बने हमारे,रोज स्कूल में मिलते थे,गजब का अनोखा अहसास होता था ये पल,अब कहाँ ??

जो बच्चे कल तक “पिताजी” का हाथ पकड़ कर चलते थे,वो आज भी कायम है !दिन गुजरते जा रहे !

अभी शुक्रवार ही बीता था,सुबह का समय रहा होगा यही करीब 4:20 – 4:25 का,घड़ी टिक-टिक की आवाज़ करते हुए पूरे जोश से आगे बढ़ रही थी,परसों ही नये सेल जो डाले थे मैंने कि तभी अचानक एक आवाज़ कानों में पड़ी,शायद जैसे कोई शिसक- शिसक के रो रहा हो । अचानक नींद टूट गयी,घर के आँगन में सब सोया करते थे खुले आसमान के नीचे । ठंडी का समय था,खटियों के पास जलाया हुआ अलाव अभी भी सुलग रहा था !घना कोहरा छाया हुआ था,रजाई हटा के उठने का तनिक भी मन न हुआ !

किसी को तनिक भी भनक न पड़ी,रजाई उठा के जैसे ही बाहर की ओर झाँकने की हिम्मत की,पैर रजाई की एक ढीली सिलाई में जा फंसा !देखा सभी खर्राटे के साथ सोये हुए थे,जैसे कुछ हुआ ही न हो । सोचा शायद कोई वहम हुआ है मुझे और जैसे ही रजाई के अंदर वापस घुसा वो रजाई चरर की आवाज़ करते हुए उस सिलाई से फट के रह गयी,एकदम सन्नाटा पसर गया था अब चारो तरफ ! वो शिश्कियो की आवाज़ भी अब आना बंद हो गयी थी,किसी तरह मैं रजाई ओढ़ के सो गया !

‘सुबह करीब 8 बजे जब नींद खुली तो अचानक पैरों तले जमीन खिसक गयी,‘मैं खून से लथपथ जमीन पर मरा पड़ा हुआ था,जमीन का काफी भाग खून से सन गया था !’

कुछ समझ न आया कि जो देख रहा हूँ,वो एक सपना है या हकीकत,सब आस-पास बैठ के रो रहे थे,पिताजी एक कोने में कुर्सी पर ऐसे अकड़कर बैठे हुए थे मानो कुछ हुआ ही न हो,माँ भी लगभग रोते-रोते बेहाल हो गयी थी,आंसुओं ने तो उसकी पूरी साड़ी को भिगा के गीला कर दिया था !

दोनों भाई मेरे बगल में जमीन पर बैठे हुए थे और बहन जो मुझसे लगभग 4 साल छोटी थी,उसके आँखों के आंसू तो थमने का नाम ही नही ले रहे थे !रोती आवाज़े कान को चीरती हुई शरीर को अधमरा किये जा रही थी !

अचानक पिताजी चिल्ला उठे, “कल रात में अपने दोस्तों के साथ घूमने न जाता तो ये न होता !”और फिर चुप हो गये !आज चस्मा भी नही पहना था बस कुछ धाराएँ थी सूख चुके आसुओं की !
कल रात वही मैं 9 बजे के आस-पास माँ के हाथों का बना दाल चावल खा ही रहा था कि अचानक एक दोस्त का फ़ोन आया । पहली बार तो मैंने पास से गुजरती माँ के ये कहने पर फ़ोन काट दिया कि सोनू बेटा पहले खा ले फिर बतिया लेना अपने दोस्त से और चली गयी !जल्दी जल्दी खाना के थाली को मैंने धीरे से फर्श पर घिसला दिया ,और हाथ भी मैंने वही नीचे बैठ कर ही धो लिए वरना छिट्टीया तो पूरी पतलून ही गीला कर देती !
दरासल,एक दोस्त जिसका आज b’day था,उसके साथ मिल के रात 12 बजे तक party करने का plan था बनाया था हमने !

“दोस्त भले ही “रक्त” से नही मिलते मगर यही दोस्त बाद में जिन्दगी का एक हिस्सा बन जाते है,जो यादें,समय इनके साथ गुजरता या बनता है,इसका आनंद तो रिहायसी महलों में भी नही ! इसलिए मैंने वापस फ़ोन कर पार्टी के लिए ‘हाँ’ बोल दी ।

घर में 10 बजे के बाद घर से निकलने का नियम न था,जो ‘काम हो सुबह करना,रात में बाहर नही जाना ’कहके रोक दिया जाता था ।

पर पिछले साल में मिले इस दोस्त के साथ school,गली मोहल्ले,घूमने-फिरने में इतनी यादें हम लोगो ने संजो के रख ली थी कि आने को मना न कर पाया मैं ।

रात 10 बजे तक जब सब खाना खा के अपने अपने बिस्तर में सोने को चले गये,तब मैं चुप-चाप घर के बाहर ताला लगा के निकल गया ।ताला इतनी आराम से लगाया कि एक आवाज़ तक न हुई,चोर बन सकता हूँ,मन में ही सोचा मैंने !

हाँ मैंने ये जरूर देखा कि मेरी बहन ने मुझे बाहर जाते हुए देखा था,पर मैंने उसको कई दिन पहले आज के लिए बताया था,और उसने किसी से कुछ कहा नही ।

ये तो था मेरे “रक्त का बंधन” और जिसके लिए मैं रात 10 बजे घर से निकला वो था “दोस्ती का बंधन” !

बाहर निकलते ही मुझे एक दोस्त हीरो हौंडा की गाड़ी से लेने आया ,उस गाड़ी की खासियत ये थी कि उसकी No Plate रडियम की थी,रौशनी पड़ने पर मस्त चमकती थी,गाड़ी में बैठकर मैं उसके साथ निकल गया ।

“और कैसा है ?” कोई जवाब न मिला ! मैंने अपने शब्द थोड़े ऊँचे कर के बोले, “और कैसा है बे ?” उसने कहा- “ हां बे बढिया हूँ,तू बता ! मैंने कहा- “मैं भी” शायद उसे पहली बार में हेलमेट की वजह से सुनाई नही दिया होगा,तभी वह जवाब नही दे पाया होगा ।
और जल्दी चला,देख पूरी सड़क खाली पड़ी है और उसने गाड़ी तेज कर दी !रास्ते में ठंडी हवाओं के साथ हिलती पत्तियां “आहा ”,जन्नत जैसा अहसास था वो !

“मुझे नही पता मैं यहाँ क्यों लेटा हूँ,इतनी भीड़ क्यों है ?” हाँ इतना याद है कि तेज गाडी के सामने कोई दौड़ता हुआ जानवर आया था !

तेज गाड़ी से वही करीब 8 से 10 मीटर की दूरी पर चौराहा रहा होगा,उसे बचाने के चक्कर में दोस्त ने ऐसा झटका मारा “मानो जैसे शरीर का पूरा वजन ब्रेक पर ही धर दिया हो !”

गाड़ी न सम्भली और मैं उछलकर चौराहे तक पहुंच गया और वो गाड़ी सहित वही गिर गया ।मुंह की कराहटे ज्यादा दूर तक न पहुंच पाई,चोट गहरी थी !

ऐसा लगा “उठ के खड़ा हो सकता हूँ,कोशिश की ही थी कि महसूस हुआ,पैर और हाथ की हड्डी कुल्हे और कोहनी के पास से टूट गयी थी !”

मेरे सिर में चोट लगी थी,बगल में लाल-लाल बहता हुआ कुछ दिखाई सा था,खून था शायद-हड्डी निकल के बाहर तक जो आ गयी थी, सिकुड़ा हुआ पड़ा था रोड में,कोई न था कई दूरी तक,रात का समय-सन्नाटा पसरा पड़ा था और ठंडी में तो वैसे भी सब जल्दी बंद हो ही जाता है ।

अचानक आँखों में एक रौशनी सी पड़ी और उसके बाद मानो पूरा शरीर जैसे शांत हो गया हो,हवाओं के साथ ये कांपता शरीर एकदम शिथिल महसूस होने लगा ,पूरा ट्रक शरीर पर से निकल गया था ।

बस इतना ही ध्यान था,उसके बाद “मुझे घर किसने पहुंचाया,दोस्त कहा गया,पार्टी हुई या नही-कुछ याद नही अब !”

हाँ पर उन रोती हुई चीखों,शिस्कियों और आवाजों के साथ कभी मैं भी हंसता और खेलता और गुनगुनाता था……पर,

“आज मैं शांत था,बोलने का मन तो था ,मेरे शब्द आज मुख से निकलने को फड़फड़ा रहे थे पर आवाज़ को कानों तक पहुंचाना अब मुमकिन न था !”

अपने जन्मदिन के 4 दिन पहले ही,मैं चुप हो गया हमेशा के लिए,दूर हो गया था इस बेहया,कभी न समझ आने वाली जिन्दगी से आज !
शरीर में जान न थी वरना परिवार को जिस तरह से आज रोते-बिलखते,शिस्कियाँ और आंसू पोछते हुए देखा,रोने से रोक न पाता खुद को ।

आज मैं आजाद हो गया था अपने “रक्त” से,परिवार से,समाज से और इस हसीं दुनियां से,जिसे देखना और समझना अभी भी बाकी था ।

“आज पंख लग गये थे,शरीर में,कही भी उड़ के जा सकता था,जितनी तेज मन करता उतनी तेज !”

अब कोई न था रोकने वाला,न किसी का डर,न ही किसी का भय ।

जाते वक्त बहन ने जो साथ दिया,को कभी चाहकर भी भूल न पाउँगा ! और दोस्तों संग बिताया वो हर पल मैं अपनी कब्र में सज़ा के रखूंगा !

आज दर्द न था सिर्फ दुनियां से अलविदा कहने का बल्कि दर्द तो एक और भी था वो था “रक्त का दर्द !”

तड़पते,बिलखते,चिल्लाते हुए “अपने रक्त” को देखना,जिससे मैं बना था-जिनके साथ कभी खेला था,चाहकर भी भुला न सकूंगा !

ये मेरे अंतिम शब्द थे,शरीर को आजाद करने तक,अब आगे न बोल पाउँगा,बाकि दर्द साथ लेकर जाऊंगा ।

हाँ सिर्फ इतना कह सकता हूँ,ये था मेरे……“रक्त का दर्द” !

Author - Dheerendra Kumar Gautam

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