●सूखी प्यास●


रोड आज फिर अकेले तनहा लेटी हुई थी,गर्मी ने उसे बेजान कर उसकी सारी खूबसूरती छीन ली थी,हर तरफ सिर्फ “सन्नाटे का शोर” था,गजब का रुतबा था सन्नाटे का,गरम हवाएं तो ऐसे आवाज़ करती दौड़ रही थी मानो किसी ने खदेड़ रखा हो !

दिन के यही करीब 12 बजे होगे,सूरज सिर के उपर जो घूम रहा था,आग किसने लगाई उसमें,ये सवाल अक्सर मुझे खटकता रहा,आज हर पंख के साथ वो भी मेरे साथ उड़ रहा था,आँख ओझल कर देने वाली रौशनी छुपा रखी थी उसने अपने अंदर !

खौफ इतना गहरा कि सभी पेड़-पौधों ने सिर झुका लिए थे,पत्तियां तो अलग-थलग होकर बिखर सी गयी थी !

कभी-कभी एक-दो वाहन आते दिखाई दे जातेे थे और कुछ पैदल यात्री,जिनके घर यही आस-पास ही होगे,मैं उनमे से कुछ को जानता भी था,हाँ सही में !

और नजरे घुमा के देखा तो,ईंटो की धमक साफ़ दिखाई दी,लोगों का आशियाना बन चुके थे ये घर,अंदर जैसे कोई खजाना छुपा रखा हो,बाहर आने की फुरसत ही नही थी किसी को !

कि अचानक मुझे गले में सूखेपन का अहसास हुआ,मैं अभी हवा में ही था,कि गर्मी मेरे शरीर को चीरने लगी ! पंखो ने फड़फड़ाने से इंकार कर दिया,और मुझे एक छत पर बैठने को बेबस कर दिया !

दूर-दूर तक बूंद की एक सूरत न दिखाई पड़ी,पेड़ लगभग अब नाम मात्र ही बचे थे,छाया भी पेड़ो के साथ जैसे कहीं कट के चली गयी थी !

कदमों की रफ़्तार धीमी सी हो गयी,छत के एक किनारे छाँव तो मिली पर उससे सिर्फ अपने आधे बदन को ही ढक पाया मैं, “प्यास” शरीर को अधमरा किये जा रही थी,आज उड़ के काफी दूर आ पहुंचा था मैं !

कि अचानक मुझे एक साथी आता दिखाई दिया,आँखें बड़ी हो गयी मेरी,पर शायद उसकी नजर मुझपर नही पड़ी !

“आवाज़ लगाकर उसे बुलाने की कोशिस की,पर उसके कानों तक पहुंचने से पहले ही मेरे शब्द शायद कही खो के रह गये !”

आख़िरकार उसने मुझे देख ही लिया,उसकी हालत भी कुछ ठीक नही दिखाई दे रही थी,आकर मेरे पास बैठा और पानी पीने की इच्छा जाग्रत की…..

मैं निशब्द था-उसे देने के लिए न ही मेरे पास कोई जवाब था और न ही पानी की वो चमचमाती बूंदे (जो पत्तियों पर ओस के रूप में जम कर उन्हें एक स्वर्ग प्राप्त कर देने वाली खूबसूरती प्रदान करने की हैसियत रखती है !)

“दोस्त मुझसे अब उड़ा नही जा रहा,मेरी मदद करो !”-दबे शब्दों में उसने मुझसे कहा !
‘अब मृत्यु से लड़ता जीव किसी को कैसे मृत्यु से निकलने के उपाय बता सकता है ?’

रुको भाई,मिल के कुछ करते है “दिलाशा देते हुए मैंने उसके कानों तक अपने सूखे शब्द पहुंचा दिए !”

शायद दोनों का एक दूसरे से मिल जाने का सहारा उन्हें बचाने का काम करने वाला था,दूर-दूर उन गरम हवाओं के अलावा और कुछ दिखाई नही दे रहा था,कभी कभी तो छतों पर या किसी घर के कोनों में रखा पानी मिल भी जाता था,पर आज किस्मत ने भी अपने हाथ खड़े कर रखे थे !

कि अचानक आँखों के सामने के घर के गेट खुलने की आवाज़ कानों को आई , गर्दन बेझिझक उस ओर मुड़ गयी,अंदर की भीनी खुसबू अब बाहर आने लगी थी,शायद कुछ अच्छा भोज बन रहा था उस घर की दीवारों के बीच !

“कि तभी एक लडके के कदम फाटक से बाहर आ पहुंचे,हाथों में पानी से भरा एक मिट्टी का बर्तन लिए आगे बढ़ा वो,और चंद क़दमों पर बाहर बने बरामदें के दूसरे छोर पर बैठने वाली छोटी सी पटिया पर रख दिया !”

महसूस हुआ कोई शक्ति हमें बचाने का पूर्ण प्रयास कर रही है,शायद इतनी गर्मी को देखते हुए उसके घर के लोगों में दयाभाव की भावना जाग्रत हुई होगी, ‘कि पक्षियों के लिए कुछ पानी बाहर रखा जाना चाहिए !’

कुछ छण तो वो बाहर की खुली हवाओं से बात करता रहा और फिर अचानक भीतर की ओर भागा शायद किसी ने बुलाया होगा !

प्यास से छुटकारा पाने के लिए जैसे ही हम दोनों ने उस बरतन तक उड़ान भरी,कि अचानक आया हुआ तेज हवा का झोंका उस मिट्टी के बर्तन को खिसकाकर पटिया के किनारे तक ले पहुंचा !

कुछ ही कदमों का फासला रहा होगा हमसे उस बर्तन का,धीरे-धीरे हवाओं में अठखेलियाँ करता हुआ जमीन पर जा गिरा और वीरगति को प्राप्त हो गया !

पंखों ने साँस लेने से मना कर दिया,और शरीर बिन कहे वापस छत की ओर मुड़ गया ! पैरों ने जिस सिददत से छत को अब पकड़ रखा था,कोई आशिक अपनी महबूबा को भी अपनी बांहों में न भरता होगा !

शरीर का बचा-कुचा पानी,अपनी कीमत समझाने के लिए,आँखों तक आ पहुंचा !

तुरंत एक खाब आया कि कुछ लोग किस बेइन्तहा ढंग से पानी को बहते हुए छोड़ देते है ?,उस नीर को,उस गले की प्यास बुझाने वाले तरल को, “जो प्रकृति की सौन्दर्य देन है ??”

“मेरे विचार से तो पानी को कैद करके भविष्य के लिए व्यर्थ बहने से बचाना चाहिए,क्योंकि यही पानी की बूंदे ही हमे जिन्दा रखती है,एक तरफ देखा जाए तो इसका भी दुनियां में अपना स्थान है,नजर अंदाज नही कर सकते इसको हम !”

सिर्फ मेरे सोचने से कुछ नही होगा,कई बार हमे ऐसी कई चीज़ों का महत्व पता चलता है,जिनका हम अनजाने में गलत सदुपयोग करते है,बचाने की पहल हम सबको करनी चाहिए,उस हर बूँद को जो बेवजह बहती है ! आज एक गले की “सूखी प्यास” ने मुझे “नीर की औकात” बता दी थी !
“आँखों में आसुओं ने अपनी पहचान बताकर गालों तक रिसना शुरू कर दिया,मृत्यु आती हुई दिखाई दी !”

कि सहसा एक बूँद बंद आँखों पर गिरी,पूरे बदन की अकड़न उसी छण पिघल के रह गयी,सनसनी सी मच गयी इस बेजान हो रहे शरीर में, तभी अचानक एक दूसरी बूँद फिर आकर टकराई ! “क्या लगाव था मुझसे इनका ?”,जो इतने करीब तक आ पहुंची थी आज मुझसे मिलने के लिए !

अचानक मौसम में हुए इस परिवर्तन की आशा मैंने कभी न की थी,मृत्यु को पास आकर जाते हुए देखा मैंने !
रिस-रिस कर गालों से गले तक पहुंची उन पानी की बूंदों ने मुझमे नई जान डालकर अपनी कीमत का अहसास करा दिया था !

एक बार फिर नये जोश और जूनून ने दस्तक दी,पंख एक बार फिर फड़फड़ा उठे,आँखों ने फिर इस प्राकृतिक दुनियां को देखने की इच्छा जाहिर की,पूर्ण रूप से नई शक्ति का प्रसार हुआ,और मैं उठ खड़ा हुआ !

“एक नयी उड़ान का साथ मिला,शरीर तो मानो जैसे कागज जैसा हो गया हो,एकदम हल्का,कभी न भुला देने वाला दिन था आज !”

“सूखी प्यास”आपसे क्या कहना चाहती है,जरूरत नही शायद अब कहने की मुझे !”

साथी ने तो इस लम्हें को चुपचाप महसूस किया,बिन कहे,बिन सुने,बिन बोले,एक नई चमक थी उसके चेहरे में आज,तभी अचानक पंख फैला कर बोला- “ आओ चले दूर कही फिर 😉!”

Author :- Dheerendra Kumar Gautam

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