शीर्षक
अंततः मिल ही गये दो पदक हमारे देश को। हमारा देश भारत। भारत, हिंदुस्तान, जम्बूद्वीप, आर्यावर्त। देश जो सोने की चिड़िया कहलाता था, देश जहाँ दूध-दही की नदियाँ बहती थीं। देश जो अब ओलंपिक में बड़ी मुश्किल से दो पदक जीतता है। पाँच हज़ार साल पुरानी सभ्यता के लिये इतनी बड़ी उपलब्धि।
चीख-पुकार, माला-फूल, पुरस्कार-सम्मान, जय-जयकार, आदर-सत्कार। भारत की ‘बेटियों’ ने गर्वान्वित कर दिया भारत को दो पदक दिलाकर। विश्व में नाम ऊँचा कर दिया, विख्यात कर दिया पदक तालिका में नीचे कहीं नाम जुड़वाकर।
बचपन में पत्रकारों की एक जीप खड़ी देखी थी पांडेय जी के घर के बाहर जब उनकी लड़की ने टॉप किया था परीक्षा में।

लड़की होकर टॉप कर दिया’, ‘बेटी ने बाज़ी मारी’, ‘लड़कों को पीछे छोड़ा लड़की ने’, ‘घर गृहस्थी में भी उतनी ही निपुण जितनी पढाई में’, ‘फ़ैशन का शौक़ नहीं रखती’, ‘पिछले १० सालों से दिन के १६ घंटे की सिर्फ़ पढाई।’
अगले दिन अख़बारों में पढ़ते रहे और मन ही मन शर्म और ईर्ष्या से कुढ़ते रहे। उस दिन के बाद से पांडेय जी की लड़की को फ़िर कभी उस नज़र से नहीं देखा गया जैसा आमतौर पर हर लड़की को देखा जाता रहा।
आज टीवी पर ‘भारत की बेटियों’, ‘लड़कियाँ किसी से कम नहीं’, ‘लड़कियों ने बचाई भारत की शान’ जैसे चीख पुकार मचाते भारत के चौथे स्तम्भ के कर्णधारों को देखकर पांडेय जी की बेटी की याद आ गयी। हालाँकि अब उसका कुछ पता नहीं है।

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