उस दिन

तूफ़ान अब उठ रहे थे मन में,
बिजलिया खड़क रही थी जीवन में,
अब संहार करने था मैं तैयार,
ले चलने को नैय्या अब पार,
मैं भी भीषण अवतार में आया,
ओ बैरी तुमको क्यों नहीं भाया?
मैं भी कर सकता तब वार,
पर रोकने लगा था मेरा प्यार,
तुमको भी मैं अब क्या बतलाता,
तुमको भी अब क्या सिखलाता,
घडिया अब तो बित चुकी थी,
प्रेम की नदियाँ सुख चुकी थी,
अब तो बेहतर था कि चलने लगु,
तुम बिन ही जीवन में सँभालने लगु,
तुमको आना हो तो तुम आ जाना,
नहीं तो यादों के सहारे मैंने जीवन बिताना,
शायद कुछ तो कमियाँ मेरी भी होगी,
और कुछ तो गलतियां तेरी भी होगी,
पर भुगतना तो मुझे अब अकेला ही हैं,
क्योंकि तेरे लिए तो जिन्दगी वैसे भी मेला ही हैं |

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