मैं कौन हूँ ?

तू मेरी नक़ल करती जा
मैं तेरी नक़ल करता जाऊं

फिर एक दिन मिलूंगा 
किसी पहचानी सी राह पर 
जहाँ पर होगा 
एक सुन्दर सा आस्मां 
छोटा सा ज़र्द मकान 
जर्जर दीवारें 
और बंजर ज़मीन

मैं मिलूंगा तुझको ऐसे ही हालत 
खुद में खोया हुआ 
खुद में ही मस्त 
दुनिया की कोई परवाह नहीं 
किसी से कोई वास्ता नहीं

तू देखता रहेगा मुझे 
यूँही 
टुकुर टुकुर 
पीछा करेगा मेरा
हर छोटी से बड़ी जगह तक

चीखेगा चिल्लायेगा 
फिर कुछ देर सबकुछ भुलाकर 
देखता रहेगा उस आस्मां को 
जिसमे मेरे कुछ सबूत तैर रहे होंगे 
जो कर रहे थे बेसब्री से इंतज़ार 
तुझपे पे बरसने को

और 
इस दरमियान 
तो मेरी नक़ल कर रहा होगा

लेकिन सच सच बता 
तू मैं तो नहीं बन सकता ना ?

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