राष्ट्रभाषा छोड़िये, आइये हिंदी को क्षेत्रीय भाषा के अधिकार दिलाएं -सरकार क्या कर सकती है

एक कहावत आपने सुनी होगी कि जिसका कोई वाली नहीं होता, उसका हाल बहुत बुरा होता है। कहने को सब उसके होते हैं पर वास्तव में उसका अपना कोई नहीं होता। हिंदी के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ। हिंदी को राष्ट्रभाषा/ राजभाषा बनाने की जितनी बार जुगत हुई उतनी बार हासिल जमा शून्य रहा। सच कहा जाए तो इन कोशिशों में उसका कोई माई-बाप ही नहीं रह गया। आप तमिल लीजिए या मराठी या बांग्ला,हर भाषा का एक घर है, उसके अपने चाहने वाले हैं। उनके लिए राज्य सरकारें हैं जो ढुल-मुल ही सही पर भाषा का स्तर बनाये रखने का प्रयास तो कर ही रही है। भारतेंदु हरिश्चंद्र की बात हर कोई मानता है कि‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल’, लेकिन हर किसी की निज भाषा उसकी प्रांतीय भाषा है,जिसे वह अपनी मान रहा है, उसकी उन्नति के लिए लड़-भिड़ रहा है। हिंदी तो राम भरोसे चल रही है,उसकी जिम्मेदारी कोई भी नहीं उठाना चाहता। इसकी वजह भी साफ़ है हिंदी के बिना किसी का काम नहीं अड़ता। आप दक्षिण भारत चले जाइए, वहां के लोग या तो उनकी अपनी मातृ भाषा समझते हैं या अंग्रेजी के जानकार है। वहां हिंदी की पूछ-परख़ ही नहीं है। उत्तर भारत में हिंदी है लेकिन उसके अलावा तमाम स्थानीय बोलियां और ज़ाहिरन अंग्रेजी का वर्चस्व तो है ही।

अन्य भाषाओं के बारे में कह नहीं सकता लेकिन हिंदी के लिए कंप्यूटर पर एक मानक कुंजीपटल तक नहीं बन पाया है। भारत सरकार ने मंगल फॉन्ट को मानक बताया है लेकिन उसे भी सभी इस्तेमाल नहीं करते। हिंदी को इंटरनेट पर लाने में एक दिक्कत सार्वत्रिक कुंजीपटल के न होने से हो रही है। यदि किसी ने एक कुंजीपटल का इस्तेमाल किया है और किसी और ने दूसरे का, तो उसे कन्वर्ट किए बिना नहीं पढ़ा जा सकता। फिर क्रियोलीकरण की प्रक्रिया हावी होने लगती है। भाषा को उसकी लिपि से दूर करने की इस प्रक्रिया ने अफ्रीका की कई बोलियों-भाषाओं को लोप की कगार पर पहुंचा दिया। भारत में भी इसके ख़तरे को नकारा नहीं जा सकता। हिंदी को रोमन लिपि में लिखने का चलन हावी हो रहा है और कई बड़े नामी लेखक उसे सही भी करार दे रहे हैं। किसी भाषा से उसकी लिपि छीनना मतलब देह में से प्राण निकाल लेने जैसा है, फिर उसके जीवित रहने के आसार कितने बचेंगे भला? यदि कोई एक राज्य सरकार भी अपनी सोच बदलकर हिंदी पर भी अपना उतना ही अधिकार दर्शा दें तो चीज़ें बदल सकती है। कोई एक राज्य सरकार कह दें कि व्यावसायिक तौर पर हिंदी को रोमन में नहीं लिखा जा सकता तो देखिए विज्ञापन जगत में हिंदी की मांग में कितनी तेजी से बढ़ जाती है। ज़रूरत इस तरह के ठोस कदम उठाने की है।

किसी भी एक राज्य सरकार की तरफ़ से यह बात आ जाए कि हिंदी फिल्मों या हिंदी धारावाहिकों में काम करने वालों के लिए हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करना अनिवार्य है। या वे हिंदी की अमुक स्तर की परीक्षा देने के बाद ही उस माध्यम में काम कर सकते हैं, तो फिर देखिए सार्वजनिक जीवन में हिंदी कैसे‘कूल’ बनती है। जबकि अभी हालात पूरी तरह जुदा है। हिंदी फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में काम करने वाले हिंदी नहीं जानते और दु:खद यह है कि वे इसे स्वीकार करने में शर्म नहीं, शान महसूस करते हैं। उन्हें जो पटकथा दी जाती है उसकी भाषा हिंदी होती है पर लिपि रोमन। इक्का-दुक्का अभिनेता-अभिनेत्री धाराप्रवाह हिंदी में बात करते हैं तो वह ख़बर बन जाती है, जबकि ख़बर तो तब होनी चाहिए जब वे बात न कर पाए। ख़बर बनती है क्योंकि ऐसा कभी-कभार, छठें-चौमासे होता है।

यदि कोई एक राज्य सरकार कानून बना दे कि हिंदी मीडिया- प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक, दोनों में वे ही लोग काम कर सकते हैं, जिन्होंने हिंदी माध्यम से शिक्षा प्राप्त की है या हिंदी की एक स्तरीय परीक्षा उत्तीर्ण की है, तो देखिएगा पत्रकारिता में हिंदी का स्तर कैसे ऊँचा उठता है। और इस कानून को पूरे प्रबंधन के लिए,संपूर्ण मैनेजमेंट के लिए लागू कर दिया जाना चाहिए। उम्मीद की जा सकती है तब हिंदी अख़बारों को भी अंग्रेजीदां होने से बचाया जा सके। अभी तो हिंदी के बड़े अख़बारों ने भी अंग्रेजी को अपनाना, पेज थ्री की ख़बरों को अंग्रेजी भाषा-रोमन लिपि तक में देना शुरू कर दिया है। यदि हिंदी के अख़बार ही ऐसा करते हो तो हिंदी अपना दुखड़ा रोने भी कहां जाए?

हिंदी का एक बड़ा बाज़ार है, आवश्यकता है कि उसे सही तरीके से भूनाया जाए। हिंदी को सामयिक,प्रासंगिक और प्रचलित करना होगा। जब तक बच्चों और उनके माता-पिता को ऐसा नहीं लगता कि हिंदी में पढ़-लिखकर भी अच्छी नौकरियाँ मिल सकती है, ज़मीनी स्तर पर कोई बदलाव होने से रहा। लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा को नौकरी से जोड़ दिया, नौकरी को अंग्रेजी से जोड़ दिया। हम इतने सालों में उस गणित को उलट नहीं पाए कि शिक्षा, ज्ञान प्राप्ति के लिए हो, नौकरी के लिए नहीं। अंग्रेजी भाषा के रुप में सीखी जाए, नौकरी मिलने के माध्यम के रुप में नहीं। ऐसा क्यों हुआ कि ग़रीब से ग़रीब तक को लगा कि यदि उसके बेटे को बड़ा बाबू बनना है तो उसे अंग्रेजी माध्यम में ही पढ़ाना होगा। अंग्रेजी आने पर ही यह जो नौकरी मिलने की अनिवार्यता है, क्या उसे ख़त्म नहीं किया जा सकता?

हाल-फिलहाल के हालात में मनोरंजन और मीडिया जगत से बड़ा ऐसा कोई बाज़ार नहीं है, जिसका काम हिंदी के बिना नहीं हो सकता और हमें इसी बाज़ार को हिंदीमय बनाना होगा। आप जिस भाषा में सोचते हैं, आप उसी में और उसी के बारे में लिख सकते हैं। इसमें काम करने वालों को हिंदी में सोचना-लिखना होगा। यह काम कुछ सांकेतिक प्रयोगों जैसे हिंदी फिल्मों के नाम हिंदी में लिखो, जैसे झुनझुनों से नहीं होगा। आधारभूत बदलाव करने होंगे जिससे की इन दोनों उद्योंगों की आत्मा बदले और जिस भाषा की बदौलत इन माध्यमों में पैसा आता है, वे उस भाषा के लिए पैसा खर्च करना भी सीखें।

….. जारी