दुष्यंत कुमार #1
मत कहो
मत कहो आकाश में कोहरा घना है,
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से,
क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है।
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है,
हर किसी का पांव घुटनों तक सना है।
पक्ष और प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं,
बात इतनी है कि कोई पुल बना है।
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेज़ना है।
हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक़ से डूबे जिसे भी डूबना है।
दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है,
आजकल नैपथ्य में संभावना है।
सूना घर
सूने घर में किस तरह सहेजूँ मन को।
पहले तो लगा कि अब आयीं तुम, आकर
अब हँसी की लहरें काँपी दीवारों पर,
खिड़कियाँ खुली अब लिए किसी आनन को।
पर कोई आया गया न कोई बोला,
खुद मैंने ही घर का दरवाज़ा खोला,
आदतवश आवाजें दीं सूनेपन को।
फिर घर की ख़ामोशी भर आई मन में,
चूड़ियाँ खनकती नहीं कहीं आँगन में,
उच्छ्वास छोड़कर ताका शून्य गगन को।
पूरा घर अंधियारा, गुमसुम साए है,
कमरें के कोने पास खिसक आये हैं,
सूने घऱ में किस तरह सहेजूँ मन को।
धूप की चादर
कहीं पे धूप की चादर बिछा कर बैठ गए,
कहीं पे शाम सिरहाने लगा के बैठ गए।
जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा,
बहुत से लोग वही छटपटा के बैठ गए।
खड़े हुए थे अलावों की आँच लेने को,
अब अपनी-अपनी हथेली जला के बैठ गए।
दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों,
तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए।
लहू-लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो,
शरीफ़ लोग दूर जाके बैठ गए।
ये सोच कर कि दरख़्तों की छाँव होती है,
यहाँ बबूल के साये में आके बैठ गए।