कुछ तो था !

तुम्हारे लिए दिल में कुछ तो था।
क्या? 
कैसे कहूँ ; खुद को स्पष्टता नहीं है पूरी अभी। 
पर इतना ज़रूर कहूंगा , कुछ तो था।

कभी लगे चाहत ,
कभी लगे ज़रूरत ,
कभी लगा आदत ,
कभी लगा इबादत ,
और तो और एक बारगी 
को ये भी लगा की शायद मोहब्बत।

तुम्हारा सवाल जायज़ होगा की आखिर क्या था?

शब्दों ने कई बार दिया है धोखा !
आज भी दे रहे हैं। 
नहीं समझ पा रहा; क्या था?
पर इतना ज़रूर कहूंगा , कुछ तो था।

तुम्हारा आस-पास होना एक खुशनुमा एहसास था। 
तुम्हारा ख्याल मात्र हीं कई दफ़ा वजहे मुस्कान था। 
कई बार अकेले होता हूँ तोह सोचता हूँ। 
आखिर ऐसा क्यूँ था ?
जवाब नहीं मिलता, 
दिल और दिमाग भी सिर्फ इतना कहते हैं — 
“जवाब! वो तो पता नहीं। 
पर इतना ज़रूर कहूंगा , कुछ तो था। “

शायद एक स्वार्थी आस मात्र थी 
अपनी खुशी पास रखने की;
पर कुछ तो था।

ऐसा नहीं की तुम्हारे निर्णय से 
दुःख न हुआ हो। 
तुम्हारी परिस्थिति समझ सकता हूँ। 
पहले शायद दिल में कुछ और होगा 
पर 
अब तुम्हारे लिए दिल में बस 
आदर और शुभकामनाएँ हैं।

ना हीं ऐसा है की 
तुम्हारे बग़ैर मैं खुश नहीं रह पाउँगा। 
खुश रहने के वास्ते और रास्ते तो निकाल हीं लूँगा। 
पर फिर क्यूँ 
अब भी मन हिलोरे मार के ये सोचता है; 
की आखिर तुम साथ होती तो ये ख़ुशी कैसी होती?
अब! शायद इस सवाल का जवाब भी नहीं चाहिए।

अगर अब भी मुझसे पूछोगे ;
क्या? कैसे? क्यूँ ?
जवाब नहीं दूंगा। 
पर इतना ज़रूर कहूंगा , कुछ तो था।