क्या सच में लोकतंत्र खतरे में है ?

हाल ही में संपन्न हुए गुजरात राज्यसभा के चुनावों में दोनों पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर दिखी। जिसमे सबसे ज्यादा चर्चा में अहमद पटेल की सीट थी, जो खतरे में थी। हालांकि वो चुनाव जीत गए पर ये चुनाव राजनीती के गिरते स्तर को चीख चीख बयां कर रहे थे।
वोटिंग करते हुए कांग्रेसी विधायकों द्वारा अमित शाह को अपना बैलट पेपर दिखाना सच में लोकतंत्र और चुनाव आयोग के मुँह पर तमाचा था। हालाँकि कांग्रेस द्वारा अप्पति दर्ज करने पर वोट अमान्य घोषित कर चुनाव आयोग ने साबित कर दिया की देश में संविधान सर्वोपरि है और शायद इसी वजह से पटेल चुनाव जीत पाए.

बीते ३ वर्षों से देश में जिस तरह की राजनीतिक उठापटक चल रही औरकेंद्र में सत्ता धारी पार्टी जिस तरह से हर कीमत पर सिर्फ अपनी सरकार और अपनी जीत ही चाहती है और वो भी किसी भी कीमत पर उससे पता चलता है की राजनीती कितनी तेजी से नया कलेवर ले रही.

चाहे वो पूर्व की उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार हो या उत्तर प्रदेश के राज्यसभा चुनाव हर जगह लोकतंत्र का गला घोटने की कोशिश की गयी। फिर मणिपुर और गोवा के चुनाव और हाल ही में बिहार घटनाक्रम इन सभी जगहों पर जनता द्वारा सबसे ज्यादा सीट पाने वाली पार्टी विपक्ष में है ,बजाए सरकार बनानेके। वो बात अलग है की सत्ता पक्ष इसे मोदी और शाह के मैनेजमेंट का नतीजा मान रहा लेकिन मैनेजमेंट वास्तव में है क्या है भी सब जानते ही है।
बात सिर्फ सरकार बनाने या गिराने तक ही सीमित नहीं है ,किन्तु विभिन्न देशव्यापी मुद्दों पर हमारे नेताओं और राजनीतिक दलों का रवैया हैरान करने वाला हैं।
विपक्ष में रहने पर भाजपा जिन नीतियों का विरोध करती रही अब खुद उन्ही का अनुसरण कर रहीहै। (हो सकता है मोदी जी को अब वास्तविकता का अंदाजा हुआ हो या ये भी हो सकता है की पूर्व में वो अपना विपक्ष धर्म निभा रहे हो। )किन्तु सोचने वाली बात है मनमोहन जी को मौनमोहन कह कर मजाक उड़ने वाले नेता खुद सरेआम भीड़ द्वारा पीट पीट कर मार डालने पे मौन ही रहे। वो एक बात है की हाल ही में एक संघ कार्यकर्ता की हत्या होने पर अरुण जेटली केरल जाकर आये और उस हत्या की निंदा भी की। क्या वो जुनैद के घर गए या पहलु खान के घर जाकर उसकी हत्या की निंदा की ?
पहले ५६ इंच का सीना होता था बाद में प्रोटोकॉल तोड़कर पाकिस्तान के प्रधानमत्री के साथ चाय पर चर्चा की गयी। चीन से आँख दिखाकर बात करने का सुझाव वाले मोदी दोकलाम मुद्दे पर मौन है
चुनाव के समय जनता को बरगलाना और चुनावी घोषणा पत्रों को केवल चुनावों तक ही सीमित रखना इन दोनों मुद्दों पर ही सरकार और चुनाव आयोग को विचार करना चाहिए।
लोकतंत्र के लिए एक मजबूत विपक्ष भी उतना ही जरुरी है जितना मजबूत सत्ता पक्ष का होना लेकिन अफ़सोस विपक्ष एकजुट नहीं और उस पर भी मौका पाते ही नेता पाला बदल ले रहे जिससे वो और कमजोर ही हो रहा साथ हि लोकतंत्र भी। उसपर भी जनता के भेजे गए प्रतिनिधियों की इस तरह से खरीद फरोख्त और जबरन पाले में खीचने की कोशिश क्या लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं है ?जवाब आप खुद बताइये।
